हमीरपुर के मौदहा की जादुई चांदी की मछली का इतिहास सदियों पुराना है। कभी देश-विदेश में मशहूर रही यह हस्तकला अब संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव में विलुप्ति की कगार पर है। पढ़े पूरी खबर।

UP News:उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मौदहा कस्बे की चांदी की मछली की अनूठी हस्तकला कभी देश-विदेश में अपनी पहचान रखती थी। दावा है कि इस कला का जिक्र मुगलकालीन ऐतिहासिक ग्रंथ आईना-ए-अकबरीमें भी मिलता है। पानी में तैरने वाली इस खास मछली को बनाने का हुनर अब एक ही परिवार तक सिमटकर रह गया है। सरकारी प्रोत्साहन की कमी, बाजार में सीमित मांग और कद्रदानों के अभाव के चलते सैकड़ों साल पुरानी यह कला विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। UP News
मौदहा की इस अनूठी हस्तकला का इतिहास कई सदियों पुराना बताया जाता है। सर्राफ परिवार के बुजुर्ग गुलाबदास ने चरखारी के महाराजा की नुमाइश में सम्मान पाने के उद्देश्य से चांदी की ऐसी मछली तैयार की थी, जो पानी में छोड़ने पर तैरने लगती थी। मछली की इस खासियत से प्रभावित होकर महाराजा ने गुलाबदास को 52 गज का साफा बांधकर सम्मानित किया था। UP News

परिवार से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, मुगल सम्राट अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल की रचना आईना-ए-अकबरी में भी इस कला का उल्लेख मिलता है। दावा है कि वर्ष 1810 में परिवार के तुलसीदास ने चांदी की मछली ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को भेंट की थी। इससे प्रभावित होकर महारानी ने उन्हें तांबे का पदक प्रदान किया था। दिल्ली के प्रगति मैदान और चेन्नई के स्वामी विवेकानंद मेले जैसे आयोजनों में भी इस हस्तकला को सराहना और पुरस्कार मिलने की बात कही जाती है। UP News
इस मछली की सबसे बड़ी खासियत इसकी बारीक कारीगरी और पानी में तैरने की क्षमता बताई जाती है। इसे पूरी तरह हाथों से तैयार किया जाता है। कारीगरों के मुताबिक, मछली का वजन 5 ग्राम से लेकर 2.5 किलोग्राम तक हो सकता है। इसके आकार, वजन और बनावट के आधार पर कीमत 1,500 रुपये से शुरू होकर 5.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। हिंदू परंपरा में मछली को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से विशेष अवसरों, त्योहारों, विवाह और वर्षगांठ पर चांदी की मछली उपहार में देने की परंपरा भी रही है। UP News
इतिहास और सांस्कृतिक महत्व रखने वाली इस हस्तकला को आगे बढ़ाने में कई चुनौतियां सामने आ रही हैं। परिवार के मुताबिक, पर्याप्त आर्थिक सहायता, सरकारी प्रोत्साहन और बाजार उपलब्ध नहीं होने से इस काम से होने वाली आय सीमित है। यही वजह है कि परिवार की अगली पीढ़ी भी इस पारंपरिक हुनर को अपनाने के बजाय उच्च शिक्षा हासिल कर नौकरी की ओर बढ़ रही है। यदि इस कला को समय रहते संरक्षण, आर्थिक सहायता और व्यापक बाजार नहीं मिला, तो मौदहा की यह विशिष्ट पहचान धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। स्थानीय स्तर पर इस हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल, प्रदर्शनियों में अवसर और ऑनलाइन बाजार से जोड़ना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। UP News
विज्ञापन