पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस समय अपने राजनीतिक अस्तित्व के एक अहम दौर से गुजर रही है। पार्टी की मौजूदा चुनावी स्थिति और कई राज्यों में कमजोर होते जनाधार ने उसके राष्ट्रीय दल के दर्जे को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस समय अपने राजनीतिक अस्तित्व के एक अहम दौर से गुजर रही है। पार्टी की मौजूदा चुनावी स्थिति और कई राज्यों में कमजोर होते जनाधार ने उसके राष्ट्रीय दल के दर्जे को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी का एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में भी बसपा का प्रतिनिधित्व खत्म हो चुका है। लोकसभा में पार्टी का कोई सांसद नहीं है, जबकि राज्यसभा में मौजूद एकमात्र सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड समेत जिन राज्यों में पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहां बेहतर प्रदर्शन उसके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को बनाए रखने की दिशा में अहम साबित हो सकता है। UP News
बसपा को वर्ष 1996 में चुनाव आयोग से राष्ट्रीय राजनीतिक दल का दर्जा मिला था। पार्टी के संस्थापक कांशीराम के बाद मायावती ने संगठन की कमान संभाली और उत्तर प्रदेश में कई बार सरकार बनाई। एक समय देश के कई राज्यों में बसपा का प्रभाव दिखाई देता था, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा देशभर में एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही। पार्टी को करीब 2.04 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके मुकाबले 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2009 में पार्टी के खाते में 21 और 2004 में 19 लोकसभा सीटें आई थीं। UP News
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए निर्धारित मानकों में से कम से कम एक को पूरा करना होता है। इनमें चार या अधिक राज्यों में राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता हासिल करना, लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम चार राज्यों में छह प्रतिशत वैध मत हासिल करने के साथ लोकसभा की कम से कम चार सीटें जीतना या लोकसभा में निर्धारित संख्या में सीटें जीतना शामिल है। इन मानकों को देखते हुए बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राज्यों में अपना चुनावी आधार और राज्य स्तरीय मान्यता मजबूत बनाए रखना है। UP News
उत्तर प्रदेश कभी बसपा का सबसे मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 22.24 प्रतिशत था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी। रसड़ा से जीते उमाशंकर सिंह के निधन के बाद अब विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं है। 2022 के चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत करीब 12.88 प्रतिशत रहा था। सीटों की संख्या और मत प्रतिशत में आई यह गिरावट पार्टी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है। UP News
फिलहाल बसपा का विधानसभा स्तर पर प्रतिनिधित्व सीमित रह गया है। बिहार, पंजाब और उत्तराखंड में पार्टी के एक-एक विधायक हैं। उत्तराखंड में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन मंगलौर सीट के विधायक करीम अंसारी के निधन के बाद हुए उपचुनाव में यह सीट पार्टी के हाथ से निकल गई। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में पार्टी के कई विधायकों के दूसरे दलों में जाने से भी बसपा का संगठन कमजोर हुआ है। UP News
राजस्थान में वर्ष 2019 में बसपा के सभी छह विधायकों के कांग्रेस में विलय ने पार्टी को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में भी समय-समय पर बसपा के विधायकों के पार्टी छोड़ने या निष्कासन की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसका असर पार्टी के संगठन के साथ-साथ कई राज्यों में उसके चुनावी प्रभाव पर भी पड़ा है। UP News
बसपा ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाए रखने के लिए लंबे समय से उत्तर प्रदेश के बाहर भी चुनाव लड़े हैं। हालांकि कई राज्यों में पार्टी का वोट प्रतिशत बेहद कम रहा है। पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हालिया चुनावों के दौरान पार्टी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। मध्य प्रदेश में भी पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा है। ऐसे में अलग-अलग राज्यों में मजबूत संगठन और पर्याप्त मत प्रतिशत हासिल करना बसपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। UP News
आने वाले विधानसभा चुनाव बसपा के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। खासतौर पर उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में पार्टी बेहतर प्रदर्शन के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। पार्टी के सामने केवल सीटें जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि कई राज्यों में अपना वोट प्रतिशत बढ़ाना और राज्य स्तरीय मान्यता से जुड़े मानकों को बनाए रखना भी जरूरी होगा। यदि बसपा इन चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो उसके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को लेकर चुनाव आयोग के स्तर पर सवाल और गंभीर हो सकते हैं। बसपा की मौजूदा स्थिति में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को दोबारा मजबूत करने की है। उत्तर प्रदेश में कमजोर हुए जनाधार के साथ दूसरे राज्यों में भी पार्टी का प्रभाव सीमित हुआ है। UP News
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