मायावती का 'मिशन 9 अक्तूबर', खामोशी से रची जा रही बड़ी सियासी चाल
भारत
चेतना मंच
26 Aug 2025 02:46 PM
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भले ही अगला विधानसभा चुनाव करीब डेढ़ साल दूर हो, लेकिन सियासी सरगर्मी अभी से तेज होती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच सीधा मुकाबला तय माना जा रहा है, लेकिन इस बीच बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती चुपचाप एक बड़ी रणनीति पर काम कर रही हैं। UP News
मायावती 2027 के चुनाव को ‘करो या मरो’ की लड़ाई मानते हुए बसपा को फिर से खड़ा करने की तैयारी में जुट गई हैं। इस अभियान की शुरुआत वे 9 अक्तूबर को करने जा रही हैं, जो बसपा संस्थापक कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है। इस बार यह सिर्फ श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं, बल्कि बसपा के 'मिशन 2027' की मजबूत नींव रखने का दिन बनने वाला है।
'मिशन 9 अक्तूबर' क्या है?
9 अक्तूबर को मायावती लखनऊ में एक बड़ी रैली करने जा रही हैं। सभी जिलों में भी कार्यक्रम आयोजित होंगे। यह आयोजन सिर्फ श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को आगामी रणनीति से अवगत कराने और सियासी ताकत दिखाने का मंच बनेगा। मायावती इसी दिन से ‘मिशन 2027’ की घोषणा कर सकती हैं, जिसके जरिए वह सत्ताधारी बीजेपी और विपक्ष में खुद को विकल्प के रूप में पेश करना चाहेंगी। यह वही रणनीति है, जिसमें वे अपनी कोर वोटबेस यानी दलित समाज के साथ-साथ अतिपिछड़े और मुस्लिम समुदाय को जोड़ने की कवायद कर रही हैं।
पंचायत चुनाव बना बसपा की राजनीतिक प्रयोगशाला
बसपा इस बार 2026 के पंचायत चुनाव को पूरी गंभीरता से ले रही है। पार्टी मान रही है कि ये चुनाव ही आगामी विधानसभा चुनाव की नींव रखेंगे। पंचायत स्तर से अपनी जड़ें फिर से मजबूत करने के लिए बसपा कैडर कैंप, बूथ मीटिंग्स और सामाजिक संवाद पर फोकस कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं और समाज के विभिन्न वर्गों को पार्टी से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती का पूरा फोकस इस बार स्थानीय नेताओं को सक्रिय करना और नए चेहरों को मौका देना है।
‘सोशल इंजीनियरिंग’ की वापसी की कोशिश
मायावती की रणनीति फिर से 2007 के फॉर्मूले की याद दिलाती है, जब उन्होंने दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण बनाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इस बार भी पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समुदाय को बड़ी संख्या में टिकट देने की तैयारी है। बसपा नेताओं का कहना है कि पंचायत चुनाव में अच्छा प्रदर्शन न सिर्फ पार्टी की पकड़ मजबूत करेगा, बल्कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए भी राजनीतिक जमीन तैयार करेगा।
साइलेंट स्ट्रैटेजी पर काम कर रहीं मायावती
मायावती अपनी राजनीति के लिए हमेशा से शांत लेकिन सटीक रणनीति के लिए जानी जाती रही हैं। इस बार भी बिना किसी बड़े प्रचार या गठबंधन के वह अपनी पार्टी को मजबूत करने की अंदरूनी तैयारियों में लगी हुई हैं। उन्होंने प्रदेशभर में कमेटियों का गठन किया है, जो अलग-अलग समाजों के लोगों को जोड़ने का काम कर रही हैं। दल बदलवा कर नेताओं को शामिल करना, नए उम्मीदवारों को तराशना और जमीनी कैडर को दोबारा सक्रिय करना सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है।
यह सवाल सबसे बड़ा है। 2007 के बाद से बसपा का वोट शेयर लगातार गिरा है। कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं और गैर-जाटव दलितों का भरोसा भी डगमगाया है। 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने बसपा को सियासी हाशिए पर खड़ा कर दिया है। अब मायावती के सामने दोहरी चुनौती है एक तरफ पार्टी का बिखरा जनाधार, दूसरी तरफ यूपी की ध्रुवीय राजनीति में तीसरी ताकत के रूप में खुद को स्थापित करना। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि अगर मायावती को सियासी पुनर्जन्म चाहिए, तो उन्हें समझौता राजनीति पर भी विचार करना होगा क्योंकि आज का चुनावी दौर गठबंधनों का दौर है। UP News