20 जून से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा जंतर-मंतर पर चलाए जा रहे धरने ने मानसून सत्र को हंगामे भरा बना दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों की आवाज उठाई, तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में हो लिए।

UP News; NEET पेपर लीक और छात्रों के आंदोलन को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सड़क से संसद तक की एकजुटता यूपी की सियासी गलियारों में तूफान ला रही है। इसने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए विपक्षी गठबंधन की नई तस्वीर पेश की है।
20 जून से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा जंतर-मंतर पर चलाए जा रहे धरने ने मानसून सत्र को हंगामे भरा बना दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों की आवाज उठाई, तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में हो लिए। दोनों नेताओं ने सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए NEET घोटाले पर चर्चा की मांग की और संसद नहीं चलने दिया। इस बीच सपा सांसद डिंपल यादव पर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई।
पीएम हाउस के बाहर धरना
21 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल कांग्रेस सांसदों के साथ धरना देने पहुंचे तो उनका साथ देने अखिलेश यादव भी आ पहुंचे। पुलिस ने धरने को जबरन हटाया। राहुल अखिलेश समेत कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया। इस घटना का सबसे तेज असर उत्तर प्रदेश में दिखा। लखनऊ समेत प्रदेश के कई जिलों में सपा-कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किए। कई जगह पुलिस से झड़प हुई और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। दोनों दलों के छात्र संगठन पूरे मोर्चे पर सक्रिय रहे।
विपक्ष की नई रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह जुगलबंदी महज NEET मुद्दे तक सीमित नहीं है। यह 2027 यूपी चुनाव के लिए दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा लगती है। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने भाजपा को यूपी में करारी शिकस्त दी थी। अब दोनों दल उसी गठबंधन को और मजबूत करने पर काम कर रहे हैं। हालांकि सीट शेयरिंग को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
राहुल गांधी युवा मुद्दों — बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा सुधार — को लगातार उठा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि सरकार से नाराज युवा वोटर, 10-12 प्रतिशत फ्लोटिंग वोट और राहुल की गैर-जातिवादी अपील से प्रभावित हो सकते हैं जिससे गठबंधन को फायदा मिलेगा। अखिलेश यादव ने इस बात को समझा है इसलिए उन्होंने नीट के मुद्दे को अहमियत दी। अखिलेश और अन्य सपा सांसद बिल्कुल ही नई किस्म की रणनीति अपनाते दिखे।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि चुनौतियां भी मौजूद हैं। 2017 में ‘दो युवराजों’ की जोड़ी यूपी में बुरी तरह हारी थी। अभी भी सीट बंटवारे पर अखिलेश यादव ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं दिख रहे, जबकि कांग्रेस अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती है। भाजपा की मजबूत संगठनात्मक ताकत, सत्ता का लाभ और उपचुनावों में दिखी क्षमता विपक्ष के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि दिल्ली की जुगलबंदी को यूपी की जमीन पर दोहराना आसान नहीं होगा। लेकिन यह भी सच है कि विपक्ष को अब श्रीराम मंदिर चढ़ावा, खाद की कमी, नकली दवाएं और बिजली दरों जैसे मुद्दों के साथ ही नीट का मुद्दा मिला है जो जातियों के पार जाकर एक सार्वभौमिक असर रखता है।
NEET आंदोलन विपक्ष को युवा असंतोष को भुनाने का बड़ा मौका दे रहा है। अगर राहुल-अखिलेश इस एकजुटता को बनाए रखने में सफल रहे तो 2027 में यूपी की सियासी तस्वीर बदल सकती है। लेकिन गठबंधन की स्थिरता, सीट शेयरिंग और भाजपा की रणनीति अंतिम फैसला तय करेगी।
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