चंदौली में लगातार बारिश, अधिक आर्द्रता और खेतों में नमी के कारण धान की फसल में शीथ ब्लाइट और जीवाणु झुलसा जैसे रोगों का खतरा बढ़ गया है। कृषि विज्ञान केंद्र चंदौली ने किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की है।

UP News : उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में लगातार बारिश, अधिक आर्द्रता और खेतों में बनी नमी ने धान की फसल को लेकर किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मौजूदा मौसम में धान की फसल में विभिन्न रोगों और कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, चंदौली ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। केंद्र पर बड़ी संख्या में किसान फसल से जुड़ी समस्याएं लेकर पहुंच रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र रघुवंशी ने किसानों से धान के खेतों की नियमित निगरानी करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि फसल में रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही नियंत्रण के उपाय शुरू कर देने चाहिए। किसानों को स्वस्थ और प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करने तथा रोगग्रस्त खेत से बीज लेने से बचने की सलाह दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि बिना विशेषज्ञ की सलाह के अलग-अलग रसायनों को मिलाकर फसल पर छिड़काव न करें। गलत तरीके से रसायनों का इस्तेमाल फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ आर्थिक नुकसान भी बढ़ा सकता है।
धान में इस समय शीथ ब्लाइट का खतरा भी बढ़ सकता है। यह रोग Rhizoctonia solani नामक फफूंद के कारण होता है। इसकी शुरुआत आमतौर पर पानी की सतह के आसपास निचली पत्ती की म्यान पर हरे-भूरे या कत्थई रंग के अंडाकार धब्बों से होती है। अनुकूल मौसम मिलने पर ये धब्बे तेजी से ऊपर की ओर फैल सकते हैं और पत्तियां सूखने लगती हैं। इसका प्रतिकूल प्रभाव धान में दाना भरने की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को खेत में अनावश्यक जलभराव से बचने, यूरिया का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने तथा मेड़ों और खेत को खरपतवार से मुक्त रखने की सलाह दी है। यदि शीथ ब्लाइट के लक्षण दिखाई दें तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशक का प्रयोग किया जा सकता है। UP News :
कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. अभयदीप गौतम ने बताया कि लगातार बारिश, अधिक नमी, तेज हवा और खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहने की स्थिति में जीवाणु झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। इस रोग की शुरुआत में धान की पत्तियां धूसर-हरी होकर मुड़ने लगती हैं। इसके बाद पत्तियों के किनारों पर पीले अथवा भूसे के रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं। समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो रोग तेजी से फैल सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि खेत में अतिरिक्त पानी जमा न होने दें और जरूरत पड़ने पर उसकी निकासी की उचित व्यवस्था करें। इसके अलावा नत्रजनयुक्त उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल करने से भी बचना चाहिए।
कृषि विज्ञान केंद्र की एडवाइजरी में रासायनिक नियंत्रण के लिए अनुशंसित मात्रा में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के प्रयोग की सलाह दी गई है। हालांकि, किसी भी रसायन का प्रयोग स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करना उचित होगा। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे धान की फसल का नियमित निरीक्षण करें और रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें, ताकि समय रहते फसल को संभावित नुकसान से बचाया जा सके। UP News :
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