वेदमती जन्म से ही दिव्यांग हैं और बौद्धिक दिव्यांगता की श्रेणी में आती हैं। इसके चलते वे कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं से वंचित हैं। हैरानी की बात यह है कि उनके पिता श्रीभास सुपकार ही नहीं, बल्कि उनके दादा जदुनाथ सुपकार भी पद्मश्री सम्मान से सम्मानित रह चुके हैं, इसके बावजूद मामला लटका हुआ है।

UP News : जिस परिवार को देश ने पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा हो, उसकी बेटी को भी अगर बुनियादी अधिकार के लिए दर-दर भटकना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बनारसी हथकरघा और वस्त्र उद्योग को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले पद्मश्री श्रीभास चंद्र सुपकार की 25 वर्षीय बेटी वेदमती सुपकार पिछले डेढ़ साल से दिव्यांगता प्रमाणपत्र के लिए संघर्ष कर रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग अब तक प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका।
वेदमती जन्म से ही दिव्यांग हैं और बौद्धिक दिव्यांगता की श्रेणी में आती हैं। इसके चलते वे कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं से वंचित हैं। हैरानी की बात यह है कि उनके पिता श्रीभास सुपकार ही नहीं, बल्कि उनके दादा जदुनाथ सुपकार भी पद्मश्री सम्मान से सम्मानित रह चुके हैं, इसके बावजूद मामला लगातार लटका हुआ है।
श्रीभास सुपकार के अनुसार, उन्होंने दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग में अपनी बेटी का पंजीकरण पहले ही करा दिया था। वहां से उन्हें मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को आवेदन देने की सलाह दी गई। इसके बाद 11 जून 2024 को सीएमओ को पत्र लिखकर अनुरोध किया गया कि बेटी की गंभीर स्थिति को देखते हुए मेडिकल जांच के लिए डॉक्टरों की टीम घर भेजी जाए। बावजूद इसके, न तो कोई टीम पहुंची और न ही विभाग की ओर से कोई ठोस जवाब मिला। उन्होंने बताया कि कई बार अधिकारियों से संपर्क किया गया, लेकिन हर बार यही आश्वासन मिला कि मामला सीएमओ तक पहुंचा दिया गया है और जल्द फोन आएगा। डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी न कोई कॉल आया और न ही प्रमाणपत्र की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
दस्तावेजों के अनुसार, वेदमती सुपकार का जन्म 17 मई 2000 को हुआ था। वे सामान्य वर्ग से हैं और उन्हें कॉर्पस कैलोसम से जुड़ी चिकित्सकीय समस्या है। नियमों के तहत गंभीर दिव्यांगता के मामलों में मेडिकल टीम घर जाकर या वीडियो कॉल के माध्यम से सत्यापन कर सकती है, लेकिन इस प्रकरण में उस व्यवस्था का भी पालन नहीं किया गया। श्रीभास सुपकार का कहना है कि यह सिर्फ उनकी बेटी की समस्या नहीं है, बल्कि उस तंत्र की हकीकत है, जहां सम्मान तो दिया जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर आम नागरिक की तरह न्याय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस मामले पर एडिशनल सीएमओ डॉ. राजेश प्रसाद ने कहा कि प्रकरण की जानकारी ली जाएगी और यह देखा जाएगा कि फाइल क्यों रुकी हुई है। यदि सभी दस्तावेज सही पाए गए, तो जांच कराकर दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी।