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प्रदेश के सहारनपुर जिले की देवबंद विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर सरगर्मी अचानक तेज हो गई है। इसकी वजह बनी हैं कैराना से सांसद इकरा हसन, जिनके एक बयान ने पार्टी के अंदर नई बहस छेड़ दी है।

UP News : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की देवबंद विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर सरगर्मी अचानक तेज हो गई है। इसकी वजह बनी हैं कैराना से सांसद इकरा हसन, जिनके एक बयान ने पार्टी के अंदर नई बहस छेड़ दी है। दरअसल, 10 अप्रैल को आयोजित एक गुर्जर समुदाय के कार्यक्रम में इकरा हसन ने पूर्व विधायक मनोज चौधरी को मंच से हमारे प्रत्याशी कहकर संबोधित किया। इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है और इसे देवबंद सीट पर संभावित उम्मीदवार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इकरा हसन का यह बयान महज सामान्य टिप्पणी नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत हो सकता है। मनोज चौधरी गुर्जर समाज से आते हैं और क्षेत्र में उनका मजबूत जनाधार माना जाता है। वह पहले विधायक रह चुके हैं और स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ भी अच्छी मानी जाती है। ऐसे में उनके नाम को आगे बढ़ाना सपा की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें पार्टी जातीय संतुलन के जरिए चुनावी समीकरण साधने की कोशिश करती है।
देवबंद विधानसभा सीट पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन सीटों में से है, जहां चुनावी गणित काफी जटिल माना जाता है। यहां मुस्लिम और दलित वोटरों के साथ-साथ गुर्जर समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके अलावा राजपूत, ब्राह्मण और त्यागी समाज का भी अच्छा-खासा प्रभाव है। यही वजह है कि किसी एक वर्ग के भरोसे चुनाव जीतना यहां मुश्किल माना जाता है। राजनीतिक दलों को ऐसा उम्मीदवार चुनना पड़ता है जो कई वर्गों को एक साथ जोड़ सके।
देवबंद सीट पर सपा से टिकट के लिए केवल मनोज चौधरी ही नहीं, बल्कि कई अन्य दिग्गज नेता भी दावेदारी कर रहे हैं। माविया अली एक मजबूत मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं और क्षेत्र में उनका स्थायी वोट बैंक है। 2016 के उपचुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की थी, हालांकि बाद में उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा। वहीं कार्तिकेय राणा भी इस दौड़ में शामिल हैं। वह 2022 में सपा के उम्मीदवार रहे थे और उनका राजनीतिक आधार भी मजबूत परिवार से जुड़ा है। इन सभी नामों के चलते टिकट की लड़ाई अब और अधिक पेचीदा होती जा रही है।
समाजवादी पार्टी को देवबंद सीट पर पिछले चुनावों में लगातार हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में पार्टी इस बार नए समीकरण बनाने की कोशिश में जुटी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा को ऐसा उम्मीदवार चुनना होगा, जो सिर्फ किसी एक समुदाय तक सीमित न रहे, बल्कि व्यापक सामाजिक समर्थन जुटा सके। यही वजह है कि पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के समर्थन में लॉबिंग भी तेज हो गई है।
हालांकि इकरा हसन का यह बयान अभी आधिकारिक घोषणा नहीं है, लेकिन इसने इतना जरूर साफ कर दिया है कि देवबंद सीट पर टिकट को लेकर अंदरूनी खींचतान शुरू हो चुकी है। पहले से ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयानों से गुटबाजी के संकेत मिल रहे थे, और अब यह बयान उस प्रतिस्पर्धा को खुलकर सामने ले आया है। देवबंद सीट पर सपा के लिए उम्मीदवार तय करना इस बार आसान नहीं होने वाला है। एक तरफ जातीय समीकरण का दबाव है, तो दूसरी ओर मजबूत दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा। ऐसे में अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि यही तय करेगा कि सपा इस महत्वपूर्ण सीट पर वापसी कर पाएगी या नहीं।
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