
इस पूरे घटनाक्रम में यूपी सरकार के मंत्री और राजभर समाज के प्रभावशाली नेता अनिल राजभर की सक्रियता ने नया मोड़ ला दिया। 5 जुलाई को मौके पर जाकर उन्होंने पुलिस से एफआईआर दर्ज करवाई, लेकिन इसी कार्रवाई को लेकर क्षत्रिय संगठनों ने सवाल उठाए कि सिर्फ एक पक्ष की बात सुनी जा रही है। आरोप यह भी लगा कि अनिल राजभर के प्रभाव में पुलिस ने पक्षपात किया। विरोध के बाद तीन दिन बाद जाकर संजय सिंह पक्ष की एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। सुभासपा के नेता अरविंद राजभर ने भी मोर्चा संभाल लिया और कार्यकर्ताओं के साथ छितौना पहुंचे। यहां से संघर्ष की शक्ल बदल गई — यह अब "समाज की लड़ाई" के रूप में परिभाषित की जाने लगी।
अरविंद राजभर के छितौना दौरे का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कथित रूप से करणी सेना और क्षत्रिय समाज के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की गई। पुलिस ने इस वीडियो को गंभीरता से लेते हुए दो युवकों के खिलाफ समाज में वैमनस्य फैलाने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में केस दर्ज किया। इस वीडियो ने सुभासपा और करणी सेना के बीच टकराव को और तेज कर दिया। करणी सेना ने 15 जुलाई को छितौना कूच का ऐलान कर दिया। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया — वाराणसी के डीएम और पुलिस कमिश्नर ने दोनों पक्षों के साथ बैठक की, जिसके बाद करणी सेना और अन्य संगठनों ने अपना प्रदर्शन स्थगित कर दिया। कई नेताओं को ऐहतियातन हाउस अरेस्ट भी किया गया। UP News
इस पूरी घटना ने बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ संजय सिंह जैसे क्षत्रिय नेता हैं जो पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं, वहीं दूसरी ओर सुभासपा जैसे सहयोगी दल के ओमप्रकाश राजभर और उनके बेटे खुलकर मैदान में हैं। राजभर समाज पूर्वांचल में प्रभावशाली भूमिका निभाता है और 2022 के विधानसभा चुनावों में जब सुभासपा ने सपा के साथ गठबंधन किया था, तब बीजेपी को आजमगढ़ और गाजीपुर जैसे जिलों में हार झेलनी पड़ी थी। अगर इस बार क्षत्रिय मतदाता असंतुष्ट हुए, तो वही नुकसान दोहराया जा सकता है। बीजेपी के लिए यह स्थिति "एक तीर, दो निशाने" वाली नहीं बल्कि "दोनों तरफ घाटा" जैसी बनती जा रही है। पार्टी के भीतर भी यह संदेश जा रहा है कि वह अपने कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों के बीच संतुलन नहीं बना पा रही। UP News