सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाल ही में एक सार्वजनिक समारोह में यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को रोकने के प्रयास किए गए थे। ये प्रयास कभी परोक्ष और कभी बहुत स्पष्ट तरीके से किए गए।

उत्तर प्रदेश के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाल ही में एक सार्वजनिक समारोह में यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को रोकने के प्रयास किए गए थे। ये प्रयास कभी परोक्ष और कभी बहुत स्पष्ट तरीके से किए गए। इसका मकसद था कि मामले की प्रभावी सुनवाई न हो और फैसला टाला जाए। यह दर्शाता है कि सिर्फ कानूनी बहस ही नहीं, बल्कि सुनवाई के क्रम में भी कई बाहरी दबावों की कोशिशें हुई थीं।
तुषार मेहता ने बताया कि जब सारे रुकावट डालने के प्रयास विफल हो गए, तब दो प्रतिष्ठित वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से वॉकआउट कर दिया। उन्होंने कहा कि वॉकआउट जैसी घटना आमतौर पर संसद में ही होती है, लेकिन राम जन्मभूमि केस में यह पहली बार न्यायालय में देखने को मिली। यह घटना यह दिखाती है कि विवादित मामलों में कानूनी पेशेवर भी कभी-कभी सुनवाई को प्रभावित करने की कोशिश में शामिल हो जाते हैं।
इस फैसले के आने के बाद राम मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। यह समारोह अत्यंत भव्य और व्यापक रूप से आयोजित किया गया, क्योंकि यह स्थल हिंदू धर्म में भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उद्घाटन ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद और कानूनी जद्दोजहद के बाद एक समापन और प्रतीकात्मक पुनर्निर्माण का रूप लिया। यह खुलासा दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में केवल कानूनी बहस ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और पेशेवर दबाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का कार्य पूरी तरह से कानून के दायरे में हुआ, और विवादित भूमि का निष्पक्ष वितरण भी सुनिश्चित किया गया। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में यह खुलासा दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने दबावों और बाधाओं के बावजूद ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह कहानी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन की ताकत का भी प्रतीक है।ा।