शब्दों का चुनाव, रूपक-उपमा की पकड़ और लय का अनुशासन साहिर को समकालीनों से अलग खड़ा करता है। इसलिए पुराने-पुराने कवि भी उन्हें “कवि” मानने से नहीं चूकते, उनकी रचनाएँ आलोचना की कसौटी पर अक्सर खरी उतरती दिखाई देती हैं।

Sahir Ludhianvi : साहिर लुधियानवी वह नाम जिसने उर्दू शायरी को सिर्फ मोहब्बत का बयान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जमाने से सवाल करने की ज़ुबान भी दी। आलोचकों ने उन्हें यूँ ही अनफवान-ए-शबाब का शायर”नहीं कहा। उनकी नज़्मों और फ़िल्मी गीतों में वही आग है, जो नौजवान दिलों को झकझोरती है और वही नर्मी, जो इंसान को इंसान के करीब ले आती है। प्रेम और प्रतिरोध को एक ही सांस में पिरोकर साहिर ने प्रगतिशील आंदोलन की कविता को नई दिशा दी। उनकी राजनीतिक नज़्मों में ग़ुस्सा भी है, मगर वह ग़ुस्सा इंसानी हमदर्दी से भीगा हुआ है। शब्दों का चुनाव, रूपक-उपमा की पकड़ और लय का अनुशासन साहिर को समकालीनों से अलग खड़ा करता है। इसलिए पुराने-पुराने कवि भी उन्हें “कवि” मानने से नहीं चूकते, उनकी रचनाएँ आलोचना की कसौटी पर अक्सर खरी उतरती दिखाई देती हैं।
8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक सामंती घराने में जन्मे साहिर का असली नाम अब्दुल हई रखा गया। कहा जाता है कि सरदार बेगम की मां चाहती थीं कि इस संबंध को कानूनी मान्यता मिले, ताकि आगे चलकर विरासत और पहचान को लेकर कोई विवाद न खड़ा हो। लेकिन जब यह बात मंजूर नहीं हुई, तो सरदार बेगम ने साहिर का हाथ थामकर अलग राह चुन ली।
1 - देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से

2 - कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया

3 - तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम

4 - मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया

5 - तुझ को ख़बर नहीं मगर इक सादा-लौह को
बर्बाद कर दिया तिरे दो दिन के प्यार ने
