शैलेश लोढ़ा ने रामकथा के भव्य मंचों और सिंहासन पर बैठकर कथा सुनाने वाले कथावाचकों पर सवाल उठाए। सोशल मीडिया पर कुमार विश्वास और बागेश्वर बाबा से जुड़ा विवाद, जानिए पूरा मामला।

UP News : उत्तर प्रदेश में राम कथा तथा रामकथा के वाचक बड़ी चर्चा का विषय बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर में रहने वाले मूलत: कवि तथा रामकथा वाचक कुमार विश्वास कथा वाचन के बदले करोड़ों रूपए का भुगतान लेते हैं। यही हाल चर्चित कथा वाचक बाबा बागेश्वर शाम वाले धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का भी है। इस दौरान कुमार विश्वास तथा धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के ऊपर एक नई बहस छिड़ गई है।
TV पर एक प्रसिद्ध शो आता है। TV पर आने वाले शो का नाम तारक मेहता का उल्टा चश्मा है। इस TV शो से चर्चित हुए शैलेश लोढा एक प्रसिद्ध कवि भी हैं। एक कवि सम्मेलन में शैलेश लोढा ने कथा वाचकों के ऊपर बड़ा आरोप जड़ा है। शैलेश लोढा ने कहा है कि अपना सब कुछ त्यागने वाले भगवान श्रीराम की कथा सुनाने वाले करोड़ों रूपए के सिंहासन से कथा सुनाते हैं। यह तो सरासर गलत है। शैलेश लोढा का यह बयान सोशल वीडियो, सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया के यूजर्स शैलेश लोढा के इस आक्रामक हमले को कुमार विश्वास के ऊपर हमला बता रहे हैं। हम आपको इस पूरे प्रकरण के विषय में सिलसिलेवार जानकारी दे रहे हैं।
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आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में इन दिनों रामकथा, कथावाचकों और धार्मिक मंचों को लेकर एक के बाद एक चर्चाएं सामने आ रही हैं। इसी बीच लोकप्रिय टीवी सीरियल 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में तारक मेहता का किरदार निभाकर घर-घर में पहचान बनाने वाले प्रसिद्ध कवि एवं अभिनेता शैलेश लोढ़ा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में शैलेश लोढ़ा रामकथा सुनाने वाले कथावाचकों की कार्यशैली पर तीखा व्यंग्य करते नजर आ रहे हैं। उनकी टिप्पणी ने धार्मिक प्रवचन और कथावाचन के बदलते स्वरूप पर एक नई बहस छेड़ दी है। शैलेश लोढ़ा ने मंच से कहा कि लोगों को मोह-माया छोड़ने की सीख देने के लिए लाखों रुपये के पंडाल लगाए जाते हैं। इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस राम ने सिंहासन का त्याग कर दिया, उनकी कथा सिंहासन पर बैठकर सुनाई जाती है। उन्होंने इसे पाखंड बताते हुए सवाल खड़ा किया। उनके इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग शैलेश लोढ़ा की बात का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ यूजर्स उनके बयान को लेकर ही सवाल उठा रहे हैं। इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग उनके निशाने को देश के दो चर्चित नामों से जोड़ रहे हैं। इनमें प्रसिद्ध कवि एवं रामकथा वाचक डॉ. कुमार विश्वास तथा बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री शामिल हैं।
शैलेश लोढ़ा के वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा कुमार विश्वास के नाम की हो रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कुमार विश्वास भी कवि होने के साथ-साथ रामकथा के लोकप्रिय व्याख्याता हैं। वह देश के विभिन्न शहरों में बड़े मंचों पर भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और रामायण के प्रसंगों की व्याख्या करते हैं। कुमार विश्वास की रामकथा में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। उनके कार्यक्रमों में भव्य मंच, आकर्षक आयोजन और बड़ी दर्शक संख्या भी देखने को मिलती है। ऐसे में शैलेश लोढ़ा के सिंहासन और भव्य पंडाल वाले बयान को कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने कुमार विश्वास की कथाओं से जोड़ दिया है। हालांकि, शैलेश लोढ़ा ने वायरल वीडियो में कुमार विश्वास का नाम लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है। इसलिए यह कहना कि उन्होंने सीधे कुमार विश्वास पर हमला किया है, अभी महज सोशल मीडिया पर लगाया जा रहा अनुमान है। कुमार विश्वास के समर्थकों ने भी इस चर्चा पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। वहीं कुछ यूजर्स ने शैलेश लोढ़ा से सवाल किया है कि यदि मंच पर बैठकर रामकथा सुनाना पाखंड है तो फिर कवि सम्मेलनों में मंच पर खड़े होकर कविता सुनाना किस श्रेणी में आएगा? इस तरह बहस केवल कथावाचकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मंच, प्रसिद्धि, धन और सार्वजनिक उपदेशों की प्रासंगिकता तक पहुंच गई है।
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इस पूरे मामले को उत्तर प्रदेश और खासतौर पर नोएडा से जोड़कर देखने की एक महत्वपूर्ण वजह भी है। प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास आगामी 13, 14 और 15 नवंबर 2026 को नोएडा में तीन दिवसीय रामकथा करने जा रहे हैं। 'अपने अपने राम' नाम से आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम नोएडा के सेक्टर-38 स्थित वर्ल्ड्स ऑफ वंडर में आयोजित किया जाएगा। आयोजन की जानकारी के मुताबिक, तीनों दिन कार्यक्रम का समय शाम 4 बजे से 7:30 बजे तक निर्धारित किया गया है।
इस आयोजन में भगवान श्रीराम के जीवन के तीन महत्वपूर्ण प्रसंगों पर चर्चा होगी।
इस कार्यक्रम का आयोजन मुकेश शर्मा की ओर से किया जा रहा है। आयोजन की घोषणा के बाद से ही नोएडा और आसपास के क्षेत्रों में इसकी चर्चा है।
ऐसे में शैलेश लोढ़ा का वीडियो ठीक उस समय वायरल हुआ है, जब नोएडा में कुमार विश्वास की रामकथा होने वाली है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, दोनों घटनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध या शैलेश लोढ़ा की ओर से कुमार विश्वास को निशाना बनाने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
शैलेश लोढ़ा के बयान की चर्चा के बीच बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का नाम भी सोशल मीडिया पर लिया जा रहा है। इसकी वजह यह है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हाल ही में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणियों के कारण विवादों में रहे हैं। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित रामकथा के दौरान उनके एक बयान का वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में उन्होंने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की मुद्राओं तथा स्वरूप की तुलना करते हुए कुछ ऐसी बातें कही थीं, जिन पर मथुरा और वृंदावन के संतों तथा कृष्ण भक्तों ने आपत्ति जताई। विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने सफाई देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण में कोई भेद पैदा करना नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी बातों से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह क्षमा चाहते हैं। इस मामले ने उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक और धार्मिक बहस का रूप ले लिया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया दी थी। अब शैलेश लोढ़ा का रामकथा के मंचों को लेकर दिया गया बयान सामने आने के बाद कुछ यूजर्स इसे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के हालिया विवाद से भी जोड़ रहे हैं। हालांकि, शैलेश लोढ़ा ने अपने वायरल बयान में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का भी नाम नहीं लिया है।
शैलेश लोढ़ा की टिप्पणी को केवल किसी एक कथावाचक पर कटाक्ष मानकर छोड़ देना इस पूरे मामले की गंभीरता को कम करके देखने जैसा होगा। उनके बयान के केंद्र में एक बड़ा सवाल है कि क्या धार्मिक उपदेश देने वाले व्यक्ति के जीवन और उसके उपदेशों में समानता होनी चाहिए? भगवान श्रीराम का जीवन त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और आदर्शों का प्रतीक माना जाता है। रामायण में श्रीराम के वनवास जाने का प्रसंग भारतीय समाज में त्याग और मर्यादा की सबसे महत्वपूर्ण मिसालों में गिना जाता है। ऐसे में शैलेश लोढ़ा ने इसी प्रसंग को आधार बनाकर यह सवाल उठाया कि जब भगवान श्रीराम ने स्वयं राजसिंहासन का त्याग किया था तो उनकी कथा सुनाने वाले लोगों को भव्य सिंहासन और वैभव के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता क्यों है? इस सवाल का एक दूसरा पक्ष भी है। धार्मिक आयोजनों में बड़े मंच, सिंहासन, पंडाल और व्यवस्थाएं कई बार आयोजन की परंपरा, श्रद्धालुओं की संख्या तथा कार्यक्रम की प्रकृति से जुड़ी होती हैं। किसी कथावाचक का मंच पर ऊंचे आसन पर बैठना अपने आप में उसके उपदेशों को पाखंड साबित नहीं करता। असली कसौटी उसके आचरण, विचारों और कथनी-करनी में समानता होनी चाहिए। यही वह बिंदु है जहां शैलेश लोढ़ा की टिप्पणी पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
शैलेश लोढ़ा के बयान पर सोशल मीडिया यूजर्स की प्रतिक्रियाएं भी कम दिलचस्प नहीं हैं। एक वर्ग का मानना है कि उन्होंने धार्मिक प्रवचन के नाम पर बढ़ते दिखावे और भव्यता पर बिल्कुल सही सवाल उठाया है। इन यूजर्स का कहना है कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को सादगी, त्याग और सदाचार की ओर ले जाना होना चाहिए। यदि धार्मिक मंचों पर भी धन, वैभव और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन होने लगे तो ऐसे आयोजनों के मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, कई लोग शैलेश लोढ़ा की टिप्पणी को अधूरा नजरिया बता रहे हैं। उनका कहना है कि किसी कथावाचक के आसन या मंच की भव्यता से उसके ज्ञान, भक्ति और धार्मिक योगदान का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। कुछ यूजर्स ने तो शैलेश लोढ़ा को ही निशाने पर लेते हुए सवाल किया है कि जब वह स्वयं बड़े मंचों पर कविता सुनाते हैं और दर्शकों की तालियां बटोरते हैं तो दूसरों के मंचों पर सवाल क्यों उठा रहे हैं? यानी इस मामले में केवल कथावाचकों की भूमिका ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंचों पर उपदेश देने वाले कलाकारों और साहित्यकारों की जिम्मेदारी भी चर्चा में आ गई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। देश में रामकथा और धार्मिक आयोजनों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। अब रामकथा केवल पारंपरिक धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों में विशाल पंडालों, सभागारों और खुले मैदानों में हजारों-लाखों लोगों की उपस्थिति में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई प्रसिद्ध कवि, संत और कथावाचक अपनी विशिष्ट शैली में रामायण के प्रसंगों की व्याख्या करते हैं। इन आयोजनों से नई पीढ़ी भी जुड़ रही है। यह निश्चित रूप से भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के विस्तार का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उठता है कि धार्मिक आयोजन में भव्यता और आस्था के बीच संतुलन कहां होना चाहिए? क्या धार्मिक मंच का आकर्षण उसके संदेश से बड़ा हो जाना चाहिए? क्या कथावाचक की लोकप्रियता और आयोजन की भव्यता ही उसकी सफलता का पैमाना बननी चाहिए? इन सवालों पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। लेकिन इतना तय है कि शैलेश लोढ़ा की टिप्पणी ने इस विषय को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में भगवान श्रीराम का विशेष स्थान है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर, प्रदेश के विभिन्न जिलों में रामकथाओं और धार्मिक आयोजनों तथा संत समाज की सक्रियता के बीच इस तरह की टिप्पणियां तेजी से चर्चा का विषय बन जाती हैं। एक तरफ नोएडा में कुमार विश्वास की तीन दिवसीय रामकथा होने जा रही है। दूसरी तरफ धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के हालिया बयानों को लेकर विवाद अभी चर्चा में है। इसी बीच शैलेश लोढ़ा की टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर एक नया मोर्चा खोल दिया है। फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि शैलेश लोढ़ा के बयान को किसी एक व्यक्ति के खिलाफ प्रमाणित हमला मानने के बजाय धार्मिक मंचों पर बढ़ते दिखावे, कथावाचकों की जिम्मेदारी और धर्म के वास्तविक संदेश पर उठे सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
राम के नाम पर होने वाले आयोजनों में भव्यता कितनी होनी चाहिए और त्याग का संदेश देने वालों का अपना आचरण कैसा होना चाहिए? शैलेश लोढ़ा के वायरल बयान ने यही सवाल एक बार फिर देश के सामने रख दिया है।
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