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प्रदेश में सियासत के रंग बड़ी तेजी से बदल रहे हैं। पूर्वांचल के जातीय और राजनीतिक समीकरण भी अहम माने जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दो काउंटरों के पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू पूर्वांचल की सामाजिक राजनीति से जुड़ा है।

UP News : उत्तर प्रदेश में सियासत के रंग बड़ी तेजी से बदल रहे हैं। पूर्वांचल के जातीय और राजनीतिक समीकरण भी अहम माने जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दो काउंटरों के पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू पूर्वांचल की सामाजिक राजनीति से जुड़ा है। बिंद, निषाद और मल्लाह समुदाय कई जिलों में प्रभावशाली वोटबैंक माना जाता है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में कमलेश बिंद एनकाउंटर का मुद्दा सपा को एक राजनीतिक अवसर के रूप में दिखाई दिया, जिसके जरिए वह निषाद समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाने का प्रयास कर सकती है। यही कारण है कि पार्टी ने इस मामले को केवल कानून-व्यवस्था के प्रश्न तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सामाजिक न्याय और पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता से भी जोड़ा। कमलेश बिंद मामले ने एनडीए के सहयोगी दलों को भी सक्रिय कर दिया है। संजय निषाद ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित करने की मांग उठाई। इसे भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि निषाद समुदाय को लेकर विभिन्न दलों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस समुदाय में किसी तरह की नाराजगी का माहौल बनता है तो उसका असर पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है।
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गाजीपुर में कमलेश बिंद के एनकाउंटर के बाद समाजवादी पार्टी ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर डिंपल यादव और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। डिंपल यादव ने सार्वजनिक रूप से पूछा कि यदि आरोपी पुलिस की गिरफ्त में था तो एनकाउंटर की आवश्यकता क्यों पड़ी। कमलेश बिंद की पत्नी और परिजनों ने भी दावा किया कि पुलिस उसे पहले ही हिरासत में ले चुकी थी और बाद में एनकाउंटर की कहानी गढ़ी गई। परिवार की ओर से लगाए गए इन आरोपों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया।
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कमलेश बिंद प्रकरण के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है। दोनों नेताओं के बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। विपक्ष जहां एनकाउंटर नीति पर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर अपनी सख्त छवि को सामने रख रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह विवाद केवल दो एनकाउंटरों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों की झलक भी दिखाई दे रही है। एक ओर भाजपा कानून-व्यवस्था के मुद्दे को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रही है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी सामाजिक और जातीय समीकरणों के जरिए नए राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटी है। यही कारण है कि असद और कमलेश बिंद के मामलों पर सपा की अलग-अलग प्रतिक्रिया को केवल संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
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