श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता को लेकर सवालों के बीच चेतना मंच ने 1987 के ‘साहित्य रत्न’ प्रमाणपत्र की मान्यता और शिक्षक एमएलसी चुनाव में उसकी वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठाई है। चुनावी शपथपत्र में दर्ज योग्यता और संबंधित नियमों की पारदर्शी जांच का मुद्दा चर्चा में है।

UP News : “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि यह व्यवस्था बदलनी चाहिए।” प्रसिद्ध कवि दुष्यंत कुमार की चर्चित पंक्ति में किया गया यह परिवर्तन आज उत्तर प्रदेश की चुनावी व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल के संदर्भ में चेतना मंच के लिए सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि पत्रकारिता के अपने दायित्व का सवाल है। चेतना मंच का उद्देश्य किसी व्यक्ति के खिलाफ हंगामा खड़ा करना नहीं है। उद्देश्य यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता, शपथपत्र और पात्रता की जांच पारदर्शी ढंग से हो तथा मतदाताओं के सामने तथ्य पूरी स्पष्टता से आएं। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मौजूदा एमएलसी और भाजपा के प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता को लेकर इन दिनों सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2021 के चुनाव में श्रीचंद शर्मा ने अपनी शैक्षणिक योग्यता में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज से वर्ष 1987 में ‘साहित्य रत्न’ का उल्लेख किया था। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के MyNeta पर उपलब्ध उनके चुनावी शपथपत्र के रिकॉर्ड में भी यही शैक्षणिक विवरण दर्ज है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी शैक्षणिक प्रमाणपत्र को बिना सक्षम संस्था की जांच के सीधे “फर्जी” घोषित कर देना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा। असल सवाल यह है कि वर्ष 1987 में हिंदी साहित्य सम्मेलन से प्राप्त ‘साहित्य रत्न’ की उस समय और वर्तमान में किस उद्देश्य के लिए क्या मान्यता थी तथा क्या उसे सामान्य स्नातक डिग्री के समान माना जा सकता है? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर संबंधित विश्वविद्यालय, शिक्षा विभाग, निर्वाचन अधिकारी और आवश्यकता पड़ने पर सक्षम न्यायिक संस्था से स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी निदेशालय के आधिकारिक FAQ में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से संबंधित परीक्षाओं की मान्यता का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए, वहां ‘प्रथमा परीक्षा’ को एक विशेष सरकारी अधिसूचना के तहत मैट्रिक के समकक्ष मान्यता मिलने की बात कही गई है, लेकिन यह मान्यता 26 नवंबर 2010 तक बताई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि अलग-अलग परीक्षाओं की मान्यता को एक ही सामान्य नियम मान लेना उचित नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने निर्णयों में भी ‘साहित्य रत्न’ की समकक्षता को लेकर अलग-अलग संदर्भ सामने आए हैं। एक मामले में न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सेवा नियमों के संदर्भ में ‘साहित्य रत्न’ की भूमिका और उसकी समकक्षता पर विचार किया था। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किसी परीक्षा की मान्यता का प्रश्न उसके समय, पद और लागू नियमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश की मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र सामान्य विधानसभा सीट नहीं है। यह ऐसी निर्वाचन व्यवस्था है जिसमें शिक्षक मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। जिला सहारनपुर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी मेरठ मंडल शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए अलग मतदाता सूची और निर्वाचन प्रक्रिया का रिकॉर्ड उपलब्ध है। ऐसे में इस सीट से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता और पात्रता से जुड़े सवालों का स्पष्ट होना लोकतांत्रिक पारदर्शिता का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। शिक्षक समाज अपने प्रतिनिधि से केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अपेक्षा नहीं करता। वह यह भी चाहता है कि उसके प्रतिनिधि की योग्यता और चुनावी शपथपत्र में दी गई जानकारी पर किसी प्रकार का संदेह लंबित न रहे।
चेतना मंच का सवाल किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का सवाल नहीं है। सवाल सीधा है कि यदि उत्तर प्रदेश की मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता पर कोई आपत्ति नहीं है, तो सक्षम प्राधिकारी उनके वर्ष 1987 के ‘साहित्य रत्न’ प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता और चुनावी पात्रता में उसकी वैधानिक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर सकते? और यदि प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध है तथा संबंधित चुनाव के लिए स्वीकार्य योग्यता है, तो उसका आधिकारिक दस्तावेज और नियम सामने आने चाहिए ताकि विवाद समाप्त हो सके। दूसरी ओर, यदि किसी स्तर पर कोई विसंगति पाई जाती है तो उसकी जांच और कानूनी कार्रवाई भी नियमानुसार होनी चाहिए। लोकतंत्र में सबसे मजबूत उत्तर आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेज होता है।
चेतना मंच किसी उम्मीदवार के खिलाफ फैसला सुनाने की भूमिका में नहीं है। फैसला मतदाताओं का है और वैधानिक पात्रता का निर्धारण सक्षम निर्वाचन एवं न्यायिक संस्थाओं का विषय है। चेतना मंच की भूमिका इतनी है कि यदि किसी उम्मीदवार के चुनावी शपथपत्र, योग्यता या पात्रता को लेकर गंभीर सार्वजनिक सवाल उठते हैं तो उन्हें दबाया न जाए और न ही बिना जांच के किसी आरोप को सत्य घोषित किया जाए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद नहीं है। हमारा मकसद है कि व्यवस्था ऐसी हो जिसमें किसी शिक्षक, मतदाता या नागरिक को चुनाव के बाद यह पूछने की जरूरत न पड़े कि उम्मीदवार की योग्यता की जांच आखिर किसने की थी।
भाजपा नेता श्रीचंद शर्मा को भाजपा ने मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा प्रत्याशी बनाया है। सितंबर 2026 में उनके समर्थन में शिक्षक संगठनों की बैठक और समर्थन की खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। ऐसे में यह सवाल केवल श्रीचंद शर्मा तक सीमित नहीं रहता। यह राजनीतिक दलों की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से भी जुड़ता है। यदि उम्मीदवार के दस्तावेज पूरी तरह सही हैं तो संबंधित राजनीतिक दल के लिए भी यह अवसर है कि वह दस्तावेज सार्वजनिक कर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब दे। भारत निर्वाचन आयोग का Candidate Affidavit Portal उम्मीदवारों द्वारा निर्वाचन अधिकारी के समक्ष दाखिल किए गए शपथपत्रों को सार्वजनिक करता है। आयोग के अनुसार नागरिक इन शपथपत्रों को देख और डाउनलोड कर सकते हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि चेतना मंच किसी के पक्ष में है या विपक्ष में। सवाल होना चाहिए कि क्या चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच का सिस्टम इतना पारदर्शी है कि मतदाता स्वयं उसके आधार पर सत्य जान सके?
चेतना मंच लोकतंत्र में विश्वास करता है। लोकतंत्र में चुनाव केवल वोट डालने की प्रक्रिया नहीं है। चुनाव का अर्थ है—मतदाता को सही सूचना मिले, उम्मीदवार की पात्रता स्पष्ट हो और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास बना रहे। इसलिए चेतना मंच की मांग किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने की नहीं है। मांग केवल इतनी है कि MLC प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा की वर्ष 1987 की ‘साहित्य रत्न’ योग्यता के मूल प्रमाणपत्र, उसकी वैधानिक मान्यता तथा शिक्षक एमएलसी चुनाव के लिए उसकी पात्रता की स्थिति सक्षम प्राधिकारी द्वारा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जाए। यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो विवाद समाप्त होना चाहिए। यदि कोई विसंगति है तो कानून अपना काम करे। यही पत्रकारिता है। यही लोकतंत्र है और यही वह बदलाव है जिसके लिए चेतना मंच कहता है—
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