
9 दिन कभी नहीं भूलूंगा
उन्नाव के गांव विजयीखेड़ा के बिंदा प्रसाद सूडान की राजधानी खार्तूम से लौटने पर सबसे पहले वतन की माटी माथे पर रगड़ी और रो पड़े। वे अपनी कहानी बता सिहर उठते हैं। उन्होंने बताया कि मौत कान के बगल से सनसनाती हुई गुजरे तो कैसा लगता है? यह पहली बार महसूस किया। भूख, डर और बेबसी के यह 9 दिन जिंदगी में कभी नहीं भूल पाऊंगा। 6 बेटियां हैं मेरी, शायद उन्हीं के नसीब से बच कर आ गया हूं। भारत की सेना और सरकार बस यही हमारे प्राणों के रखवाले बन गए। बिदा खार्तूम में भारतीय कंपनी ओमेगा स्टील के जेरनेटर आपरेटर थे। उन्होंने बताया कि तीन जून को बिटिया की बारात आनी है। मेरे पास एक लाख सूडानी पाउंड थे, बिटिया की शादी के लिए जमा किये थे। उसके लिए कुछ खरीदारी की थी, सब लूट लिया। वहां मेरी छाती पर जो रायफलें तनी थीं, वो चल जातीं तो सोनी को कौन विदा करता।’
[caption id="attachment_85560" align="aligncenter" width="800"]
Special Story: Death, hunger, looting and noise on the head, the tragedy of the workers who returned from Sudan[/caption]
मौत सामने नजर आने लगी
मलवा, फतेहपुर के अजय भी ओमेगा स्टील में हाइड्रा मशीन चलाते थे। उन्होंने बताया कि हमलावरों ने हमारी फैक्ट्री के बगल में बने फौजी कैंप पर इतने बम बरसाए कि मौत सामने नजर आने लगी। वे हमारे गेस्ट हाउस में घुसे तो कुछ नहीं छोड़ा। एक एक पैसा, कपड़े, खाना सबकुछ लूट ले गए। एक व्यक्ति ने मेरी छाती पर एके-47 जैसी रायफल रख दी। मुझे अपनी आंखों के सामने मौत नजर आने लगी। मेरे पास 200 डॉलर और 15 हजार सूडानी पाउंड थे। सब उनको दे दिए, मोबाइल भी छीन लिए। भूखे रहकर, जो मिला खाकर किसी तरह अपनी सांसे बचा रखीं थीं।
दो मुठ्ठी चावल एक कटोरी दाल खाई
सूडान से वापस लौटे लोगों ने बताया कि गृहयुद्ध के कारण सूडान में पिछले 15 दिनों से जीवन नारकीय हो गया था। कमाई तो वहीं लूट ली गई। कुछ दिन और फंसे रहते तो भूख से मर जाते। 15 से 23 अप्रैल तक कभी दो मुट्ठी चावल तो कभी एक कटोरी दाल खाकर जीना पड़ा। वहां के लुटेरे बड़ी-बड़ी गाड़ियां, मशीनें, एसी-पंखे तक उठा ले गए। दूतावास भी एक हफ्ते तक मदद न कर पाया। जब हमारी सेना पोर्ट तक पहुंच गई, तभी हम सबमें बचने का भरोसा जागा। कोई दस दिन से शरीर पर पहने वस्त्रों में लौटा तो कोई एक छोटे से बैग में एक-दो जोड़ी कपड़ा लेकर आया और कोई तो अपना कोई भी सामान नहीं ला पाया। घर लौटे लोगों ने बताया कि उन्हें भारतीय दूतावास ने पोर्ट सूडान से नेवी, आर्मी और एयरफोर्स की मदद से हमें दिल्ली लाया गया।