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भीषण गर्मी के मौसम में जिस फल की सबसे ज्यादा मांग रहती है, उसमें तरबूज सबसे ऊपर आता है। अब तरबूज सिर्फ फल भर नहीं रह गया है, बल्कि स्मूदी, मॉकटेल, शरबत, फ्लेवर मिठाइयों और कैंडी तक में इसका इस्तेमाल हो रहा है।

UP News : भीषण गर्मी के मौसम में जिस फल की सबसे ज्यादा मांग रहती है, उसमें तरबूज सबसे ऊपर आता है। अब तरबूज सिर्फ फल भर नहीं रह गया है, बल्कि स्मूदी, मॉकटेल, शरबत, फ्लेवर मिठाइयों और कैंडी तक में इसका इस्तेमाल हो रहा है। यही वजह है कि भारत में इसकी खेती तेजी से बढ़ रही है और दुनिया भर में भारतीय तरबूज की डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है। दुनिया में तरबूज उत्पादन के मामले में चीन पहले और तुर्किए दूसरे स्थान पर हैं, जबकि भारत तीसरे नम्बर पर आता है। भारत में हर साल करीब 33 लाख मीट्रिक टन तरबूज का उत्पादन होता है। खास बात यह है कि भारतीय तरबूज की सप्लाई सिर्फ देश तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, कतर, भूटान, बहरीन और नेपाल जैसे देशों तक पहुंच रही है।
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अक्सर लोग मानते हैं कि आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु तरबूज उत्पादन में सबसे आगे होंगे, लेकिन असलियत इससे अलग है। देश में सबसे ज्यादा तरबूज पैदा करने वाला राज्य उत्तर प्रदेश है। भारत के कुल तरबूज उत्पादन में अकेले यूपी की हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी बताई जाती है। इसके बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र का नम्बर आता है। इन राज्यों की जलवायु और मिट्टी तरबूज की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है, लेकिन उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश लगातार सबसे आगे बना हुआ है।
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तरबूज की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है। इस मिट्टी में पानी रुकता नहीं है और जड़ों को गहराई तक फैलने का मौका मिलता है। यही वजह है कि तरबूज ज्यादा मीठा, रसीला और बेहतर आकार का तैयार होता है। उत्तर प्रदेश का गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र इसी तरह की उपजाऊ बलुई मिट्टी से भरपूर है। आगरा, मथुरा, इटावा, प्रयागराज, वाराणसी और मिजार्पुर जैसे जिलों में नदी किनारे बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती होती है। यहां की मिट्टी का स्तर भी 6 से 7 के बीच रहता है, जिसे तरबूज के लिए आदर्श माना जाता है।
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यूपी का तरबूज ज्यादा मीठा और जल्दी तैयार क्यों होता है?
तरबूज के बीजों के अंकुरण के लिए 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और पकने के लिए 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। उत्तर प्रदेश का मौसम इन दोनों मानकों पर पूरी तरह फिट बैठता है। यहां फरवरी के आखिर से बुआई शुरू हो जाती है और मई-जून तक फसल तैयार हो जाती है। गर्मियों में कम नमी और तेज धूप की वजह से यूपी का तरबूज ज्यादा मीठा, रसीला और जल्दी पकने वाला माना जाता है।
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भारतीय तरबूज का सबसे बड़ा खरीदार संयुक्त अरब अमीरात है। इसके अलावा मालदीव, कतर, बहरीन, भूटान और नेपाल जैसे देशों में भी इसकी भारी मांग है। भारतीय तरबूज स्वाद, मिठास और क्वालिटी के कारण विदेशी बाजारों में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।
इतिहासकारों के मुताबिक तरबूज की खेती करीब 5 हजार साल पहले प्राचीन मिस्र में शुरू हुई थी। मान्यता है कि मिस्र के राजाओं की कब्रों में भी तरबूज रखा जाता था ताकि उन्हें मृत्यु के बाद भी पोषण मिलता रहे। तरबूज का लाल रंग उसमें मौजूद लाइकोपीन नामक एंटीआॅक्सीडेंट की वजह से होता है। यही तत्व टमाटर में भी पाया जाता है। हालांकि अब बाजार में पीले, नारंगी और सफेद गूदे वाले तरबूज भी उपलब्ध हैं।
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