उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ सीटें ऐसी हैं, जिनका चुनावी इतिहास सिर्फ जीत-हार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे प्रदेश के बदलते राजनीतिक मिजाज की कहानी भी बयां करती हैं। सुल्तानपुर लोकसभा सीट ऐसी ही एक हाई-प्रोफाइल सीट है, जहां हर चुनाव के साथ नए राजनीतिक समीकरण बनते और पुराने टूटते रहे हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ सीटें ऐसी हैं, जिनका चुनावी इतिहास सिर्फ जीत-हार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे प्रदेश के बदलते राजनीतिक मिजाज की कहानी भी बयां करती हैं। सुल्तानपुर लोकसभा सीट ऐसी ही एक हाई-प्रोफाइल सीट है, जहां हर चुनाव के साथ नए राजनीतिक समीकरण बनते और पुराने टूटते रहे हैं। यही वजह है कि सुल्तानपुर को कई राजनीतिक विश्लेषक अवध की सियासी नब्ज समझने वाली सीट भी मानते हैं। 1952 से लेकर 2024 तक के करीब 72 वर्षों के सफर में सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र ने भारतीय राजनीति के कई बड़े दौर देखे हैं। कांग्रेस के मजबूत गढ़ से लेकर जनता लहर, राम मंदिर आंदोलन, बहुजन राजनीति और समाजवादी पार्टी के पीडीए (PDA) समीकरण तक, हर राजनीतिक बदलाव का असर यहां साफ दिखाई दिया है। UP News
सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही कांग्रेस का प्रभाव नजर आया। पहले चुनाव में बी. वी. केसकर यहां से सांसद चुने गए। इसके बाद 1957 से 1971 तक कांग्रेस ने लगातार अपनी पकड़ बनाए रखी। इस दौरान गोविंद मालवीय, कुंवर कृष्ण वर्मा, गणपत सहाय और केदार नाथ सिंह जैसे कांग्रेस नेताओं ने जीत दर्ज कर पार्टी के मजबूत आधार को कायम रखा। एक समय ऐसा था जब सुल्तानपुर को कांग्रेस का सुरक्षित राजनीतिक किला माना जाता था। देश में आपातकाल के बाद 1977 में चली सत्ता विरोधी लहर का असर सुल्तानपुर में भी देखने को मिला। जनता पार्टी के उम्मीदवार जुल्फिकारुल्ला ने कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को खत्म करते हुए जीत हासिल की। हालांकि 1980 और 1984 के चुनावों में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की लोकप्रियता का असर दिखा और कांग्रेस ने दोबारा वापसी की। इन चुनावों में गिरिराज सिंह और राजकरन सिंह सांसद बने। लेकिन 1989 के चुनाव में जनता दल के राम सिंह की जीत ने यह साफ कर दिया कि सुल्तानपुर के मतदाता किसी एक दल के स्थायी समर्थक नहीं हैं और वे समय के साथ अपना राजनीतिक फैसला बदलते रहे हैं। UP News
1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा का प्रभाव बढ़ा और सुल्तानपुर भी इससे प्रभावित हुआ। 1991 में भाजपा के विश्वनाथ दास शास्त्री ने जीत दर्ज की। इसके बाद 1996 और 1998 में भाजपा के देवेंद्र बहादुर राय सांसद बने। वहीं बहुजन समाज पार्टी ने भी इस सीट पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। बसपा के जयभद्र सिंह ने 1999 और मोहम्मद ताहिर खान ने 2004 में जीत हासिल कर पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति को मजबूत किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में अमेठी रियासत से जुड़े और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। उन्होंने बसपा के तत्कालीन सांसद मोहम्मद ताहिर खान को हराकर कांग्रेस को लंबे अंतराल के बाद सुल्तानपुर में जीत दिलाई। 1984 के बाद यह पहला मौका था जब कांग्रेस ने इस सीट पर दोबारा कब्जा जमाया। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर सीट एक बार फिर चर्चा में आई। भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे संजय गांधी के बेटे वरुण गांधी को मैदान में उतारा। वरुण गांधी ने जीत हासिल कर भाजपा का खाता मजबूत किया। इसके बाद 2019 में भाजपा ने गांधी परिवार की ही मेनका गांधी को उम्मीदवार बनाया। मेनका गांधी ने भी जीत दर्ज कर इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रखा। 2024 के लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर के मतदाताओं ने एक बार फिर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। समाजवादी पार्टी के रामभुअल निषाद ने भाजपा की दिग्गज नेता और तत्कालीन सांसद मेनका गांधी को 43,174 वोटों के अंतर से हराकर बड़ा उलटफेर किया। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण का असर देखने को मिला। अखिलेश यादव की रणनीति और विपक्ष की ओर से उठाए गए संविधान और सामाजिक न्याय के मुद्दों को भी इस जीत से जोड़कर देखा गया। UP News
सुल्तानपुर लोकसभा सीट की सबसे बड़ी खासियत यहां के मतदाताओं का बदलता रुख है। जनता ने कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी बसपा और अब समाजवादी पार्टी को मौका दिया। यहां किसी भी नेता को लंबे समय तक लगातार समर्थन नहीं मिला। सुल्तानपुर की राजनीतिक कहानी में भाजपा नेता देवेंद्र बहादुर राय एकमात्र ऐसे सांसद रहे जिन्हें 1996 और 1998 में दो बार जीत मिली। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ इसे 1998 के मध्यावधि चुनाव की परिस्थितियों से जोड़कर देखते हैं। इसके अलावा किसी भी सांसद को लगातार दूसरी बार जनता ने मौका नहीं दिया। यही सुल्तानपुर की चुनावी राजनीति की सबसे अलग पहचान है। सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र कई बड़े नेताओं की राजनीतिक यात्रा का हिस्सा रहा है। अमेठी रियासत के राजा और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह से लेकर गांधी परिवार के वरुण गांधी और मेनका गांधी तक, कई चर्चित चेहरे इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
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