उत्तर प्रदेश की धरती से निकलने वाली लोक प्रतिभाएं अक्सर बिना किसी बड़े मंच और संसाधन के अपनी पहचान बनाती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सुनील लोधी की है, जो जन्म से दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उनकी आवाज में ऐसा जादू है कि आज लोग उन्हें सुनकर मुरीद हो रहे हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश की धरती से निकलने वाली लोक प्रतिभाएं अक्सर बिना किसी बड़े मंच और संसाधन के अपनी पहचान बनाती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सुनील लोधी की है, जो जन्म से दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उनकी आवाज में ऐसा जादू है कि आज लोग उन्हें सुनकर मुरीद हो रहे हैं। बुंदेली लोकगीत और भजन गाने वाले सुनील की आवाज अब फिल्मी दुनिया तक पहुंच चुकी है।
सुनील की पहचान इन दिनों फिल्म ‘हनुमान अंश’ के चर्चित बुंदेली भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डाल दई’ से हो रही है। गांव और स्थानीय स्तर पर भजन गाने वाले सुनील ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी साधारण-सी रिकॉर्डिंग एक दिन उन्हें मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो तक पहुंचा देगी।
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सुनील लोधी जन्म से ही दृष्टिबाधित हैं। आर्थिक परिस्थितियां भी उनके अनुकूल नहीं रहीं और इसी वजह से वह स्कूल की नियमित पढ़ाई भी नहीं कर सके। लेकिन संगीत से उनका रिश्ता बचपन से ही जुड़ गया था। वह तंबूरा के साथ भजन और बुंदेली लोकगीत गाते रहे और धीरे-धीरे यही हुनर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। सुनील की आवाज को सोशल मीडिया के जरिए नई पहचान मिली। वह ‘बुंदेली दुनिया’ जैसे प्लेटफॉर्म के लिए भजन और लोकगीत गाया करते थे। उनके कई गीत लोगों तक पहुंचे, लेकिन ‘मोरे संकट के कटैया’ ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। इस भजन की रिकॉर्डिंग ने फिल्म से जुड़े लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
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सुनील की आवाज में गाए गए भजन की सादगी और बुंदेली अंदाज ने संगीत से जुड़े लोगों को प्रभावित किया। इसके बाद उन्हें इंदौर बुलाया गया और फिर मुंबई जाने का मौका मिला। मुंबई के साईं बाबा स्टूडियो में उन्होंने करीब आठ गाने रिकॉर्ड किए। खास बात यह रही कि उस समय सुनील को यह तक मालूम नहीं था कि उनके रिकॉर्ड किए गए गीतों में से एक फिल्म का हिस्सा बनने जा रहा है।
फिल्म ‘हनुमान अंश’ नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित है। फिल्म के लिए सुनील की आवाज में रिकॉर्ड किया गया बुंदेली भजन अब श्रोताओं के बीच खूब पसंद किया जा रहा है।
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सुनील की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उनके पास न बड़े संगीत संस्थानों की ट्रेनिंग थी, न कोई फिल्मी बैकग्राउंड और न ही शुरुआत में कोई बड़ा मंच। उनके पास था तो सिर्फ तंबूरा, भक्ति संगीत और अपनी दमदार आवाज। जिस आवाज को लंबे समय तक गांव और स्थानीय आयोजनों तक सीमित माना जाता था, वही आवाज अब फिल्म के जरिए बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच रही है। सुनील की कहानी यह भी बताती है कि प्रतिभा को अगर सही मंच मिल जाए तो परिस्थितियां उसकी राह रोक नहीं सकतीं।
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सुनील के कई बुंदेली गीत सोशल मीडिया पर लोगों तक पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक, ‘मोरे संकट के कटैया’ की लोकप्रियता ने फिल्म निर्माताओं का ध्यान उनकी ओर खींचा। इसके बाद उनकी तलाश की गई और उन्हें रिकॉर्डिंग का मौका मिला। आज सुनील के लिए यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष के बाद मिली पहचान है। जिस युवक को दुनिया दिखाई नहीं देती, उसकी आवाज अब हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचकर उन्हें भक्ति और बुंदेली लोक संस्कृति से जोड़ रही है। सुनील लोधी की कहानी इस बात की मिसाल है कि आंखों की रोशनी कम हो सकती है, लेकिन अगर हुनर और हौसले की रोशनी भीतर हो तो इंसान अपनी आवाज से पूरी दुनिया को रोशन कर सकता है।
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जन्म से दृष्टिबाधित सुनील लोधी की आवाज ने ‘हनुमान अंश’ फिल्म में बुंदेली भजन के जरिए देशभर में पहचान बना ली। जानिए गांव से मुंबई तक पहुंचने की उनकी प्रेरणादायक कहानी।
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