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सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस को बड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक 4 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस के एक कमिश्नर तथा दूसरे अधिकारियों को अदालत में तलब किया है।

UP News : सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस को बड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक 4 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस के एक कमिश्नर तथा दूसरे अधिकारियों को अदालत में तलब किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच कोर्ट की निगरानी में SIT अथवा किसी केन्द्रीय एजेंसी से कराने का भी संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश पुलिस को लगाई गई सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पुलिस के पास अपने बचाव के लिए कोई कारण नहीं बचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को जिस मामले में फटकार लगाई है वह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बरती गई लापरवाही का जवाब देने के लिए गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट में तलब किया है। आपको बता दें कि गाजियाबाद में एक मजदूर की 4 साल की बच्ची थी। 16 मार्च को उनके पड़ोस काएक शख्स बच्ची को चॉकलेट दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया। जब बच्ची काफी देर तक नहीं लौटी तो उसके पिता ने उसे ढूंढना शुरू किया। पिता ने जब बच्ची को पाया तो वह बच्ची बेहोश पड़ी थी और खून से लथपथ थी। उस बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया था। पिता खून में डूबी अपनी बच्ची को लेकर पास के दो प्राइवेट अस्पतालों में गया। लेकिन इन दोनों अस्पतालों ने उस बच्ची को भर्ती करने से मना कर दिया। आखिरकार बच्ची को एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। जब परिवार ने पुलिस को इस बारे में बताया तो पुलिस ने उनकी मदद करने की बजाय परिवार वालों के साथ मारपीट की और उन्हें चुप रहने की धमकी दी। FIR यानी पुलिस में शिकायत अगले दिन यानी 17 मार्च को दर्ज की गई. घटना 16 मार्च को हुई थी।
पुलिस ने FIR में सिर्फ हत्या का मामला दर्ज किया। लेकिन जो बच्ची के साथ हुआ था वो साफ तौर पर यौन शोषण भी था। इसके बावजूद पुलिस ने POCso यानी बच्चों को यौन अपराध से बचाने वाला कानून और बलात्कार की धारा FIR में नहीं जोड़ी। 18 मार्च को आरोपी को पकड़ा गया. लेकिन पुलिस ने बाद में एक अजीब कहानी बताई। पुलिस ने कहा कि वो आरोपी को उस जगह ले जा रहे थे जहां एक रूमाल छुपाया था। वहां जाकर आरोपी ने पुलिस पर गोली चला दी और पुलिस ने जवाब में गोली चलाई। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जो आदमी पुलिस की हिरासत में था, उसके पास बंदूक कहां से आई?
यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। बच्ची के पिता की तरफ से वकील एन. हरिहरन ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट को वीडियो सबूत दिखाया जिसमें बच्ची जिंदा थी लेकिन पुलिस की रिपोर्ट कह रही थी कि बच्ची उनके पास आई तब पहले से मर चुकी थी। CJI यानी चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। CJI ने कहा कि वीडियो देखते ही उनका दिल बेचैन हो गया. कोर्ट ने कहा कि इस पूरे मामले में दोनों प्राइवेट अस्पताल और पुलिस दोनों ने पूरी तरह अमानवीयता दिखाई। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार, नंदग्राम थाने के थाना प्रभारी, दोनों प्राइवेट अस्पतालों और एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को नोटिस भेजा। गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और थाना प्रभारी को 13 अप्रैल को खुद सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में SIT यानी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम या कोई केंद्रीय एजेंसी जांच करें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पीडि़त परिवार को उत्तर प्रदेश पुलिस किसी भी प्रकार परेशान न करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया कि बच्ची और उसके परिवार की पहचान किसी भी प्रकार से जाहिर नहीं होनी चाहिए। UP News