सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर लगाया 10 लाख रुपये का जुर्माना, संभल हिंसा से जुड़े आरोपी मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द

संभल हिंसा मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई एहतियाती हिरासत को रद्द कर दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट (जुर्माना/लागत) भी लगाई है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से संभल हिंसा से जुड़े उस मामले में नया कानूनी मोड़ आ गया है, जिसमें मुल्ला अफरोज को हिंसा का कथित साजिशकर्ता बताया गया था। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर किसी व्यक्ति को NSA के तहत एहतियाती हिरासत में रखा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि ऐसे मामले में अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों और सामग्री पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। मुल्ला अफरोज की ओर से अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए यही सवाल उठाया गया था कि पुलिस कस्टडी में दिए गए कथित बयान के आधार पर बाद में उसके खिलाफ इतनी गंभीर कार्रवाई किस आधार पर की गई।
यह पूरा मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। सर्वे के दौरान हिंसा भड़कने के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी और घटना में चार लोगों की मौत हुई थी। मुल्ला अफरोज को इस हिंसा का कथित मास्टरमाइंड/साजिशकर्ता बताया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, घटना के करीब 54 दिन बाद मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उसे जमानत मिली। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया। हाईकोर्ट ने इस हिरासत को बरकरार रखा था, जिसके बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यह सवाल उठाया था कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA के तहत निवारक हिरासत का आधार बनाया जा सकता है या नहीं। 8 सितंबर को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब 29 सितंबर को अदालत न फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शीर्ष अदालत ने उस आदेश को भी पलट दिया है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA के तहत हिरासत को बरकरार रखा था। इस तरह मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के विपरीत आया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कठोर कानून के तहत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए किस प्रकार की सामग्री और कानूनी आधार जरूरी हैं। अदालत का फैसला फिलहाल मुल्ला अफरोज की NSA के तहत एहतियाती हिरासत से संबंधित है। इसे संभल हिंसा के मूल आपराधिक मामले में अंतिम दोषसिद्धि या बरी होने का फैसला नहीं माना जाना चाहिए। संभल हिंसा से जुड़े मूल आरोपों और उनकी न्यायिक प्रक्रिया अलग विषय हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद संभल हिंसा मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। एक तरफ हिंसा की घटना और उससे जुड़े आपराधिक मामले हैं, वहीं दूसरी तरफ आरोपी की निवारक हिरासत को लेकर शीर्ष अदालत ने कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्य के आधार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार पर लगाया गया 10 लाख रुपये का जुर्माना और NSA हिरासत को रद्द किया जाना इस मामले की सबसे बड़ी कानूनी घटनाओं में शामिल है।
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