बुलंदशहर के शाहजहाँ फैजुल क़ादरी ने पत्नी की याद में बनवा दिया ताजमहल
Taj Mahal of Bulandshahr
भारत
चेतना मंच
15 Nov 2023 11:45 PM
Taj Mahal of Bulandshahr आपने आगरा का ताजमहल तो देखा ही होगा, लेकिन आगरा के ताजमहल की तरह बुलंदशहर में भी ताजमहल है। आज हम इस कहानी को आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि नवंबर के महीने में साल 2018 में इस ताजमहल को बनाने वाले शाहजहाँ कि एक्सीडेंट के बाद मौत हो गई। इसके बाद से ही ताज महल वीरान पड़ा है और इसका काम भी रुक गया है। ये ताजमहल आगरा वाले ताजमहल जितना ख़ूबसूरत बेशक़ न हो लेकिन प्रेम उतना ही मौजूद है इस बुलंदशहर के ताजमहल में।
पत्नी की मोहब्बत में बना दिया ताज महल
बुलंदशहर ज़िले के डिबाई तहसील के गाँव सेराकला में भी एक ताज महल मौजूद है। ये आगरा जितना ख़ूबसूरत तो नहीं लेकिन प्रेम, मोहब्बत की गवाही देता है। यह इमारत पूरी नहीं हो पाई लेकिन जब तक इसे बनाने वाले फैजुल क़ादरी ज़िंदा थे उन्होंने अपनी पाई पाई इसमें लगा दी। इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2011 में हुई। साल 2011 में इलाक़े के रहने वाले क़ादरी साहब की पत्नी का इंतकाल हो गया। फैजुल क़ादरी पोस्ट ऑफ़िस के पूर्व कर्मचारी थे। उन्होंने अपनी पत्नी के इंतकाल के बाद अपनी पत्नी की याद में ताजमहल की तर्ज़ पर मक़बरा बनवाने की ठानी। इसके लिए वह कुछ मज़दूरों को आगरा के ताजमहल का दौरा भी करा कर लाए। क़ादरी साहब ने अपनी पेंशन और अपनी ज़मीन के टुकड़े को बेच कर इस ताजमहल के निर्माण को शुरू कराया। धीरे धीरे काम आगे बढ़ा और ताज महल बनकर तैयार हो गया। धीरे धीरे ये कहानी ना सिर्फ़ शहर बल्कि दूर दराज़ इलाकों तक भी पहुँच गई कि कैसे क़ादरी साहब अपनी बेग़म की याद में ताजमहल का निर्माण करा रहे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। 2018 का साल आया और क़ादरी साहब का देहांत हो गया।
Taj Mahal of Bulandshahr news in hindi
तमन्ना अधूरी ही रह गई
नियति के आगे किसी की नहीं चलती है। और कादरी साहब भी नियति के शिकार हो गए। दरअसल उन्हें एक बाइक सवार ने टक्कर मार दी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन वह बच नहीं सके। नवंबर 2018 में उनका निधन हुआ। तबसे ताजमहल ऐसी स्थिति में है। जब क़ादरी जीवित थे उस वक़्त के लोग बताते हैं कि वह अक्सर इस ताजमहल के पास आकर अपना पूरा पूरा दिन बिताया करते थे। क़ादरी साहब की दरियादिली इतनी थी के अपनी पत्नी के मक़बरे के नज़दीक एक राजकीय बालिका इंटर कॉलेज है, जिसकी ज़मीन क़ादरी साहब ने सरकार को दी ताकि इस कॉलेज का निर्माण हो सके। इसके पीछे सोच ये थी के गाँव की बच्चियां दूर दराज़ इलाक़े में पढ़ने जाती हैं उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए इस कॉलेज के निर्माण की पहल की गई।
आख़िरी वक़्त में सिर्फ़ ताजमहल के लिए सोचते थे
क़ादरी साहब के परिवार वालों का कहना है कि वह अपने आख़िरी समय में भी ताजमहल के बारे में ही सोचते रहे। नवंबर 2018 में भी जिस दिन उनका देहांत हुआ उस दिन वे अपने ताजमहल के लिए पत्थर लेने जा रहे थे लेकिन उनका एक्सीडेंट हो गया जिस कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया और क़ादरी साहब ने दम तोड़ दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जब शुरुआती दौर में क़ादरी साहब इस मक़बरे को बनवा रहे थे तो लोग उनके ऊपर तरह तरह के क़सीदे किया करते थे लेकिन वो अपने काम पर अटल रहे। आज यह ताज महल बनकर तैयार है जिसे उनके प्रेम के प्रतीक के तौर पर याद किया जाता है।