लिव-इन रिलेशनशिप पर आगे बढ़ने से पहले उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट के एक ताजा आदेश को जान लेना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट का नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट है।

लिव-इन रिलेशनशिप नामक असामाजिक व्यवस्था का खतरा बढ़ने वाला है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बड़ा आदेश दिया है। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिए गए उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट के आदेश के बाद लिव-इन रिलेशनशिप के मामले तेजी के साथ बढऩा तय माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिए गए अपने फैसले में साफ-साफ कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप यानि कि सहमति संबंध किसी भी प्रकार से गैर कानूनी नहीं है।
लिव-इन रिलेशनशिप पर आगे बढऩे से पहले उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट के एक ताजा आदेश को जान लेना जरूरी है। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट का नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार 19 दिसंबर 2025 को एक बड़ा फैसला सुनाया है। अपने बड़े फैसले में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सहमति संबंध गैर-कानूनी नहीं है। जोड़ों की रक्षा करना राज्य का सांविधानिक दायित्व है। बालिंग व्यक्ति मर्जी से किसी के साथ भी रहने के लिए स्वतंत्र है। परिवार या समाज का कोई भी व्यक्ति उनके जीवन में दखल नहीं दे सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने आकांक्षा सहित 12 की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 सर्वोच्च है। सिर्फ इस आधार पर कि याचिकाकर्ताओं ने शादी नहीं की है, उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। सहमति संबंध समाज को स्वीकार हो या न हो, इसे अपराध नहीं कहा जा सकता।
उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट के आदेश के बाद लिव-इन रिलेशनशिप के मामले तेजी के साथ बढऩे की आशंका है। जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता प्रदान कर दी है। इस आदेश के बाद भारत के नागरिक बिना किसी डर तथा भय के लिव-इन रिलेशनशिप को अपनाएंगे। लिव-इन रिलेशनशिप के बढऩे से शादी जैसी पवित्र संस्था के ऊपर बड़ा खतरा पैदा हो गया है। समाजशास्त्री मानकर चल रहे हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसी गैर सामाजिक व्यवस्था के बढऩे तथा फलने-फूलने से शादी की व्यवस्था बहुत कमजोर हो जाएगी। इस विषय को लेकर किसी ठोस कानून की तुरंत आवश्यकता है। भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कोई स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है।
आपको बता दें कि प्रेमी जोड़े का शादी किए बिना लंबे समय तक एक घर में साथ रहना लिव-इन रिलेशनशिप कहलाता है। लिव-इन रिलेशनशिप की कोई कानूनी परिभाषा अलग से कहीं नहीं लिखी गई है। आसान भाषा में इसे दो व्यस्कों (Who is eligible for live-in relationship?) का अपनी मर्जी से बिना शादी किए एक छत के नीचे साथ रहना कह सकते हैं। कई कपल इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, ताकि यह तय कर सकें कि दोनों शादी करने जितना कंपैटिबल हैं या नहीं। कुछ इसलिए रहते हैं क्योंकि उन्हें पारंपरिक विवाह व्यवस्था में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। चार दशक पहले 1978 में बद्री प्रसाद बनाम डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन (Badri Prasad vs Director Of Consolidation) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी थी। यह माना गया था कि शादी करने की उम्र वाले लोगों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप किसी भारतीय कानून का उल्लंघन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई कपल लंबे समय से साथ रह रहा है, तो उस रिश्ते को शादी ही माना जाएगा। लिव-इन रिलेशनशिप की जड़ कानूनी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 में मौजूद है। अपनी मर्जी से शादी करने या किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की आजादी और अधिकार को अनुच्छेद 21 से अलग नहीं माना जा सकता। साल 2001 में पायल शर्मा बनाम नारी निकेतन केस में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एक आदमी और औरत को अधिकार है अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ बिना शादी किए लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का।
इंदिरा शर्मा बनाम वी.के. शर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की धारा 2F में डोमेस्टिक रिलेशनशिप की जो परिभाषा है, उसमें लिव-इन रिलेशनशिप भी शामिल है। यानी जिस तरह इस एक्ट की मदद से शादीशुदा कपल खुद को घरेलू हिंसा से बचा सकता है, उसी तरह लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल पर भी यह एक्ट लागू होता है जस्टिस मलिमथ की कमेटी के सुझाव पर पत्नी की परिभाषा की पुनर्व्याख्या के लिए CRPC की धारा 125 में संशोधन किया गया था। समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों का पालन करते हु्ए यह सुनिश्चित किया गया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं या वो महिलाएं जिन्हें उनके पार्टनर ने छोड़ दिया है, उन्हें वाइफ (पत्नी) का दर्जा मिले। जिस तरह पति की मृत्यु के बाद पत्नी का दिवंगत पति की संपत्ति पर अधिकार होता है। ठीक उसी तरह एक महिला के लिव-इन पार्टनर की मृत्यु के बाद उसके पार्टनर की inherited property (विरासत में मिली संपत्ति) पर उस महिला का अधिकार होता है। धनूलाल बनाम गणेश राम के केस में अदालत ने माना था कि अगर एक लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय तक चलता है, तो उसे एक शादी की तरह ही माना जाएगा।
ulsa & Ors vs Durghatiya केस में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए एक बच्चे को राइट टू प्रॉपर्टी (संपत्ति का अधिकार) दिया था। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा था कि ऐसे बच्चों को नाजायज नहीं माना जाएगा, जब उसके माता-पिता काफी समय से साथ रह रहे थे।