एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल कॉरिडोर अर्थात औद्योगिक गलियारे विकसित करने का प्रस्ताव है जहाँ सुविधाजनक लॉजिस्टिक्स, सड़क संपर्क, यूनिट्स के लिए भूमि उपलब्धता आदि के माध्यम से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना है।

गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश में एक प्रमुख एक्सप्रेसवे परियोजना है, जो मेरठ से प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) तक फैली है। इसके मार्ग कई जिलों से होकर गुजर रहा है, जिनमें मेरठ, प्रयागराज और बदायूं जिला भी शामिल है। इस एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल कॉरिडोर अर्थात औद्योगिक गलियारे विकसित करने का प्रस्ताव है जहाँ सुविधाजनक लॉजिस्टिक्स, सड़क संपर्क, यूनिट्स के लिए भूमि उपलब्धता आदि के माध्यम से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना है। विशेष रूप से बदायूं जिले के दातागंज और बिनावर इलाके में इस औद्योगिक गलियारे हेतु भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में है।
जानकारी के मुताबिक, बिनावर में करीब 1,600 बीघा (लगभग) और दातागंज में करीब 1,000 बीघा भूमि अधिगृहित की जा चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे आधारित औद्योगिक गलियारों के लिए अब तक 3,827 हेक्टेयर (450 एकड़) से अधिक भूमि अधिगृहीत की जा चुकी है। इसके अंतर्गत ही, उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथारिटी (यूपीईआईडीए) ने कहा है कि गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे ही 1,043 हेक्टेयर से अधिक भूमि अधिग्रहीत की गई है। निवेश आकर्षित करने की दिशा में कहा गया है कि विभिन्न कंपनियों ने प्रस्ताव दिए हैं, और सैकड़ों इकाइयों के लगने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि उन सभी प्रस्तावों की पुष्टि अभी उपलब्ध रिपोर्टों में विस्तार से नहीं मिल रही है।
इस तरह के औद्योगिक गलियारों के बनने से बदायूं जैसे जिलों को रोजगार में बढ़ोतरी, निवेश में वृद्धि, स्थानीय उद्यमियों को प्राथमिकता मिलने जैसी सुविधाएँ मिल सकती हैं। भूमि की कीमतों में उछाल आना शुरू हो चुका है जहाँ पहले भूमि की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं, अब प्रस्ताव के चलते मूल्य में वृद्धि देखी गई है। बेहतर रोड कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स की सुगमता, बड़े निवेशकों का आकर्षण ये सभी मिलकर क्षेत्रीय विकास को गति दे सकते हैं। कृषि उद्योग लिंक बनाने की दिशा में यह प्रोजेक्ट एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है जैसे सड़क मार्ग के माध्यम से कृषि उपज के परिवहन एवं प्रसंस्करण को बढ़ावा मिलना आदि।
भूमि अधिग्रहण सुनने में जितना सरल लगता है, असल में वहाँ किसानों, भूमि मालिकों की स्वीकृति, मुआवजा, स्थानांतरण प्रक्रिया आदि जटिलता ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेरठ में भी इसी तरह एक इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए जमीन चिन्हित है पर किसानों का विरोध जारी है। सिर्फ भूमि उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है उद्योगों को आकर्षित करने के लिए बिजली, पानी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रोड, लॉजिस्टिक्स, कर्मचारियों की उपलब्धता आदि सभी बुनियादी बातें पूरी होनी चाहिए। घोषणाएँ और प्रस्ताव होते हैं पर उनका समय पर क्रियान्वयन न होना, नीतियों में देरी और निवेश की कमी रोक सकती हैं। स्थानीय आबादी को इस परिवर्तन का प्रत्यक्ष लाभ कैसे मिलेगा यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न है। रोजगार, प्रशिक्षण, उद्यमिता के अवसर आदि सुनिश्चित करने होंगे।
बदायूं जिले में इस प्रकार के औद्योगिक गलियारे का प्रस्ताव आने से उम्मीद की किरणें हैं। यह क्षेत्र अभी तक औद्योगिक रूप से प्रमुख नहीं कहला सकता था, लेकिन अब एक अवसर सामने है। यह किस तरह काम करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण, निवेश आकर्षित करना, और वास्तविक उद्योगों का स्थापना कार्यक्षम होना कितनी जल्दी और कितनी गुणवत्ता से होगा। यदि यह प्रोजेक्ट सफल होता है, तो बदायूं का बदलाव निम्न रूप में हो सकता है। यहां ग्रामीण-शहरी अंतर में कमी आएगी क्योंकि उद्योग गाँव के नजदीक विस्तार कर सकते हैं। स्थानीय युवा, श्रमिकों को रोजगार मिल सकता है, जिससे पलायन कम हो सकता है।
भूमि और रियल एस्टेट पर प्रभाव होगा।