ग़ालिब की पहचान सिर्फ़ ग़ज़लों तक सीमित नहीं; उनके ख़त (पत्र) उर्दू गद्य की नई भाषा, नया लहजा और नई सोच गढ़ते हैं इसलिए उन्हें उर्दू लेखन की अहम दस्तावेज़ी विरासत माना जाता है। भारत और पाकिस्तान दोनों में ग़ालिब का मुक़ाम बराबर ऊँचा है।

Mirza Ghalib: मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान जिन्हें दुनिया “ग़ालिब” के तख़ल्लुस से जानती है उर्दू और फ़ारसी अदब के वो बड़े नाम हैं जिनकी शायरी आज भी उतनी ही ज़िंदा लगती है, जितनी अपने दौर में थी। उन्हें उर्दू का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है, और फ़ारसी की नज़ाकत व गहराई को हिंदुस्तानी ज़बान के करीब लाने में उनका योगदान खास तौर पर याद किया जाता है हालांकि इस राह की बुनियाद पहले ही मीर तक़ी ‘मीर’ ने भी रखी थी। ग़ालिब की पहचान सिर्फ़ ग़ज़लों तक सीमित नहीं; उनके ख़त (पत्र) उर्दू गद्य की नई भाषा, नया लहजा और नई सोच गढ़ते हैं इसलिए उन्हें उर्दू लेखन की अहम दस्तावेज़ी विरासत माना जाता है। भारत और पाकिस्तान दोनों में ग़ालिब का मुक़ाम बराबर ऊँचा है। उनके अदबी कद को देखते हुए उन्हें “दबीर-उल-मुल्क” और “नज़्म-उद-दौला” जैसे प्रतिष्ठित ख़िताब भी मिले।
1 पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

2 - इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

3 - हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने Mirza Ghalib
