अनोखा मंदिर जिसमें चढ़ाए जाते रहे अंग्रेजों के सिर
उत्तर प्रदेश को भगवान की भूमि कहा जाता है। भगवान श्रीराम तथा भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश की धरती पर ही हुआ था। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में मंदिर स्थापित हैं। उत्तर प्रदेश में स्थापित हर छोटे-बड़े मंदिर का अपना एक इतिहास है।

UP News : उत्तर प्रदेश को भगवान की भूमि कहा जाता है। भगवान श्रीराम तथा भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश की धरती पर ही हुआ था। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में मंदिर स्थापित हैं। उत्तर प्रदेश में स्थापित हर छोटे-बड़े मंदिर का अपना एक इतिहास है। उत्तर प्रदेश में इन्हीं मंदिरों के बीच में स्थापित एक मंदिर ऐसा भी है जहां पर स्वतंत्रता के आंदोलन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों तथा अंग्रेज सिपाहियों के सिर चढ़ावे के रूप में चढ़ाए जाते थे।
उत्तर प्रदेश में स्थापित है माँ तरकुलहा देवी का अनोखा मंदिर
उत्तर प्रदेश में देवी मंदिरों की भरमार है। इन्हीं देवी मंदिरों में माँ तरकुलहा देवी (Maa Tarkulha Devi) का मंदिर भी शामिल है। माँ तरकुलहा देवी का मंदिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थापित है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर स्थापित माँ तरकुलहा देवी के मंदिर में जो भी कामना करके पूजा-अर्चना की जाती है वह पूजा-अर्चना स्वीकार करके माँ तरकुलहा देवी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरी करती हैं। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान माँ के भक्त स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों के सिर काटकर माँ तरकुलहा देवी के चरणों में चढ़ावे के रूप में चढ़ाते थे।
महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधु सिंह से जुड़ा है माँ तरकुलहा देवी के मंदिर का इतिहास
माँ तरकुलहा देवी के मंदिर के इतिहास की बात करें तो इस मंदिर का इतिहास महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधु सिंह के साथ जुड़ा हुआ है। माँ के भक्त बताते हैं कि मंदिर की कहानी चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह से जुड़ी है। बाबू बंधु सिंह महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। बाबू बंधु सिंह ने अंग्रेजों से बचने के लिए जंगल में छिपकर तरकुल के पेड़ के नीचे एक पिंडी स्थापित की थी। यहीं से उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कई अंग्रेज अफसरों को हराया। उनके बलिदान के दौरान तरकुल का पेड़ टूट गया, जिससे खून बहने लगा। तभी से इस पिंडी को तरकुलहा देवी के नाम से जाना जाने लगा। कहा जाता है कि बंधु सिंह को जब फांसी दी जा रही थी तब 7 बार फांसी का फंदा टूटा था। अंतत: बंधु सिंह ने देवी माँ से प्रार्थना की और कहा कि हे माँ मुझे अपने चरणों में बुला ले। तब उन्होंने खुद ही अपने गले में फंदा डाला और वीरगति को प्राप्त हुए। ये स्थल आज भी श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश को भगवान की भूमि कहा जाता है। भगवान श्रीराम तथा भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश की धरती पर ही हुआ था। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में मंदिर स्थापित हैं। उत्तर प्रदेश में स्थापित हर छोटे-बड़े मंदिर का अपना एक इतिहास है। उत्तर प्रदेश में इन्हीं मंदिरों के बीच में स्थापित एक मंदिर ऐसा भी है जहां पर स्वतंत्रता के आंदोलन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों तथा अंग्रेज सिपाहियों के सिर चढ़ावे के रूप में चढ़ाए जाते थे।
उत्तर प्रदेश में स्थापित है माँ तरकुलहा देवी का अनोखा मंदिर
उत्तर प्रदेश में देवी मंदिरों की भरमार है। इन्हीं देवी मंदिरों में माँ तरकुलहा देवी (Maa Tarkulha Devi) का मंदिर भी शामिल है। माँ तरकुलहा देवी का मंदिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थापित है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर स्थापित माँ तरकुलहा देवी के मंदिर में जो भी कामना करके पूजा-अर्चना की जाती है वह पूजा-अर्चना स्वीकार करके माँ तरकुलहा देवी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरी करती हैं। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान माँ के भक्त स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों के सिर काटकर माँ तरकुलहा देवी के चरणों में चढ़ावे के रूप में चढ़ाते थे।
महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधु सिंह से जुड़ा है माँ तरकुलहा देवी के मंदिर का इतिहास
माँ तरकुलहा देवी के मंदिर के इतिहास की बात करें तो इस मंदिर का इतिहास महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधु सिंह के साथ जुड़ा हुआ है। माँ के भक्त बताते हैं कि मंदिर की कहानी चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह से जुड़ी है। बाबू बंधु सिंह महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। बाबू बंधु सिंह ने अंग्रेजों से बचने के लिए जंगल में छिपकर तरकुल के पेड़ के नीचे एक पिंडी स्थापित की थी। यहीं से उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कई अंग्रेज अफसरों को हराया। उनके बलिदान के दौरान तरकुल का पेड़ टूट गया, जिससे खून बहने लगा। तभी से इस पिंडी को तरकुलहा देवी के नाम से जाना जाने लगा। कहा जाता है कि बंधु सिंह को जब फांसी दी जा रही थी तब 7 बार फांसी का फंदा टूटा था। अंतत: बंधु सिंह ने देवी माँ से प्रार्थना की और कहा कि हे माँ मुझे अपने चरणों में बुला ले। तब उन्होंने खुद ही अपने गले में फंदा डाला और वीरगति को प्राप्त हुए। ये स्थल आज भी श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। UP News












