बसपा के संस्थापक कांशीराम के दौर से लेकर मायावती की सरकार तक छोटे राज्यों और उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का मुद्दा चर्चा में रहा। वर्ष 2011 में मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराया था।

UP News : उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की सियासत एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने यूपी के चार हिस्सों में बंटवारे को लेकर बड़ा बयान दिया है। राजभर का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का भविष्य में चार राज्यों में बंटना तय है। उन्होंने पूर्वांचल राज्य बनने की स्थिति में राजभर समाज के मुख्यमंत्री बनने की बात भी कही है।लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन की यह चर्चा नई नहीं है। इसके पीछे करीब 71 वर्ष पुराना राजनीतिक और वैचारिक इतिहास है। इस इतिहास में डॉ. भीमराव आंबेडकर का विचार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य की मांग, मायावती सरकार का चार राज्यों का प्रस्ताव और अब ओम प्रकाश राजभर का बयान एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। UP News
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Thoughts on Linguistic States में बड़े राज्यों के प्रशासनिक आकार पर सवाल उठाया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित करने का विचार रखा था।भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंबेडकर के संपूर्ण वाङ्मय में भी उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को छोटी इकाइयों में बांटने की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।आंबेडकर के विचार में उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने का उद्देश्य प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाना था। आज जब यूपी की आबादी, जिलों और प्रशासनिक विस्तार को देखते हुए छोटे राज्यों की मांग उठती है, तो बहस का यह ऐतिहासिक संदर्भ फिर सामने आता है। UP News
उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की चर्चा केवल पूर्वांचल तक सीमित नहीं रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग भी लंबे समय से उठती रही है।पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोकदल के संस्थापक चौधरी अजीत सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग करके हरित प्रदेश बनाने की मांग को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया था। पश्चिमी यूपी में अलग राज्य की मांग के पीछे प्रशासनिक सुविधा, क्षेत्रीय विकास और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे तर्क दिए जाते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के विभाजन की राजनीति में सबसे बड़ा औपचारिक कदम तत्कालीन मुख्यमंत्री **मायावती** की सरकार के समय सामने आया।मायावती सरकार ने वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा। 21 नवंबर 2011 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित किया और उसे केंद्र सरकार को भेजने का फैसला किया।
प्रस्ताव के मुताबिक उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की योजना थी—
- पूर्वांचल
- बुंदेलखंड
- अवध प्रदेश
- पश्चिम प्रदेश/हरित प्रदेश
यानी आज से करीब 15 वर्ष पहले ही यूपी के चार राज्यों में पुनर्गठन का औपचारिक प्रस्ताव विधानसभा के स्तर पर सामने आ चुका था।
मायावती सरकार की योजना में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से को अलग करके पश्चिम प्रदेश या हरित प्रदेश बनाने की बात थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से को पूर्वांचल, मध्य क्षेत्र को अवध प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव था।यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा से पारित होकर केंद्र सरकार को भेजा गया औपचारिक प्रस्ताव था। हालांकि इसके बाद केंद्र स्तर पर राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी मौजूदा राज्य की सीमाओं में बदलाव करना या नए राज्य का गठन करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। राज्य विधानसभा की भूमिका प्रस्ताव और उसकी राय देने तक महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम संवैधानिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से पूरी होती है।मायावती सरकार का 2011 का प्रस्ताव भी इसी प्रक्रिया के तहत केंद्र को भेजा गया था। हालांकि उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन आगे नहीं बढ़ पाया।इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ और समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। यूपी के विभाजन का मुद्दा राजनीतिक रूप से पीछे चला गया।
करीब डेढ़ दशक बाद उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक मंच पर लौट आया है।20 सितंबर 2026 को देवरिया में आयोजित सामाजिक समरसता महारैली में ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा। उन्होंने पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग को भी इससे जोड़ा।राजभर ने यह भी कहा कि यदि पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो वहां राजभर समाज के व्यक्ति के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता खुलेगा। उनके बयान ने यूपी के विभाजन की पुरानी बहस को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर राजनीतिक चर्चा में ला दिया है।
उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का विचार आज से नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। 1955 में आंबेडकर के प्रशासनिक पुनर्गठन के विचार से लेकर 2011 में मायावती सरकार के विधानसभा प्रस्ताव और 2026 में ओम प्रकाश राजभर के बयान तक, अलग-अलग दौर में यह मुद्दा सामने आता रहा है।हालांकि फिलहाल उत्तर प्रदेश के चार राज्यों में पुनर्गठन को लेकर कोई नया सरकारी फैसला नहीं हुआ है। इसलिए मौजूदा समय में इसे एक राजनीतिक मांग और बहस के रूप में देखना अधिक सटीक है।उत्तर प्रदेश का आकार और प्रशासनिक विस्तार इस बहस का केंद्रीय विषय है। दूसरी ओर, राज्य का विभाजन केवल राजनीतिक घोषणा से संभव नहीं है। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, संसद की भूमिका, सीमाओं का निर्धारण, प्रशासनिक ढांचा, परिसंपत्तियों और कर्मचारियों का बंटवारा तथा वित्तीय व्यवस्था जैसे अनेक प्रश्नों का समाधान आवश्यक होगा।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ते राजनीतिक माहौल के बीच चार राज्यों का मुद्दा क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाला विषय बन सकता है। पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और अवधचारों क्षेत्रों की अपनी अलग राजनीतिक और सामाजिक पहचान है।ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश चार राज्यों में बंटेगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि यदि कभी पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो उसकी सीमाएं क्या होंगी, राजधानी कहां होगी, आर्थिक संसाधनों का बंटवारा कैसे होगा और नए राज्यों का प्रशासनिक ढांचा किस तरह तैयार किया जाएगा।फिलहाल इतना जरूर है कि आंबेडकर का 1955 का विचार, मायावती का 2011 का प्रस्ताव और राजभर का 2026 का बयानउत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की उस पुरानी बहस को फिर सामने ले आए हैं, जो समय-समय पर राजनीतिक मंचों पर लौटती रही है।
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