उत्तर प्रदेश के पूर्व आईएएस अधिकारी योगेश कुमार कौन हैं? जानिए अखिलेश सरकार के दौरान 1198 पशुधन प्रसार अधिकारी पदों की भर्ती में कथित घोटाले, ओएमआर शीट में गड़बड़ी और ईओडब्ल्यू की गिरफ्तारी की पूरी कहानी।

उत्तर प्रदेश के पूर्व आईएएस अधिकारी योगेश कुमार का नाम आज उस भर्ती घोटाले को लेकर चर्चा में है, जिसने सरकारी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए। 1980 बैच के इस अधिकारी पर वर्ष 2014 में अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई 1198 पशुधन प्रसार अधिकारी पदों की भर्ती में कथित अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगे। उस समय योगेश कुमार पशुपालन विभाग में प्रमुख सचिव थे। जांच में ओएमआर शीट के मूल्यांकन और चयन प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन के आरोप सामने आए। मामले की जांच कर रही आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (EOW) ने उनके खिलाफ साक्ष्य मिलने का दावा करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर उनके कार्यकाल और इस गंभीर मामले में सामने आई भूमिका ने उनके करियर को विवादों के केंद्र में ला दिया है। चलिए जानते हैं उत्तर प्रदेश के इस भ्रष्ट आईएएस अधिकारी के बारे में।
योगेश कुमार उत्तर प्रदेश कैडर के 1980 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। अपने प्रशासनिक करियर के दौरान उन्होंने राज्य सरकार में कई पदों पर जिम्मेदारी संभाली। वह पशुपालन विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर भी रहे। वर्ष 2014 में जब पशुधन प्रसार अधिकारी के 1198 पदों पर भर्ती हुई, उस समय विभाग की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी। इसी भर्ती में कथित अनियमितताओं को लेकर उनका नाम जांच के दायरे में आया। जिस पद पर बैठकर अधिकारियों से नियमों के पालन और पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है, उसी विभाग की भर्ती प्रक्रिया बाद में गंभीर सवालों के घेरे में आ गई। जांच एजेंसी ने भर्ती से जुड़े फैसलों और चयन प्रक्रिया में नियमों के पालन की पड़ताल की। इसके बाद योगेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की गई।
वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के दौरान पशुपालन विभाग में पशुधन प्रसार अधिकारी के 1198 पदों पर भर्ती की गई थी। यह भर्ती सहारनपुर मंडल को छोड़कर प्रदेश के बाकी 17 मंडलों में हुई थी। इसके लिए 2 फरवरी 2014 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई। परीक्षा के बाद 1005 अभ्यर्थियों का चयन हुआ और उन्हें प्रशिक्षण देकर नियुक्त किया गया। इस भर्ती में पशुधन प्रसार सेवा नियमावली 2002 और वर्ष 2013 में संशोधित नियमावली के प्रावधानों का उल्लंघन किए जाने के आरोप लगे। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद ओएमआर शीट के मूल्यांकन और मेरिट सूची तैयार करने के तरीके पर सवाल उठने लगे। जिस चयन प्रक्रिया के जरिए अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी दी गई, उसी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच शुरू हो गई।
पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती में सबसे गंभीर सवाल ओएमआर शीट की जांच को लेकर उठे। आरोप था कि मंडलीय चयन समितियों के अधिकारों के विपरीत ओएमआर शीट का मूल्यांकन एक ही जगह कराने का फैसला लिया गया। इसके लिए रायबरेली स्थित फिरोज गांधी इंस्टीट्यूट को नामित किया गया था। जांच में इस व्यवस्था और भर्ती नियमों के पालन को लेकर सवाल उठे। आरोप यह भी था कि केंद्रीकृत मूल्यांकन से अंकों में हेरफेर की गुंजाइश बनी। भर्ती प्रक्रिया में इस तरह के आरोप सामने आने के बाद तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई। रिटायर्ड IAS योगेश कुमार उस समय पशुपालन विभाग के प्रमुख सचिव थे, इसलिए भर्ती से जुड़े फैसलों में उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आई।
इस मामले में आरोप लगा कि भर्ती के लिए नियमों में इस तरह बदलाव किए गए, जिससे मंडलीय चयन समितियों के अधिकार प्रभावित हुए। सूत्रों के मुताबिक, मंडल स्तर पर मिलने वाले अधिकारों को खत्म करके ओएमआर शीट का मूल्यांकन केंद्रीय स्तर पर कराने की व्यवस्था की गई। इस फैसले को लेकर जांच एजेंसियों ने पड़ताल की कि भर्ती नियमों के अनुसार चयन प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई और इस व्यवस्था को लागू करने में किन अधिकारियों की भूमिका थी। भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर योगेश कुमार के खिलाफ भी जांच आगे बढ़ी।
पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद वर्ष 2017 में शासन ने मामले की जांच विशेष जांच दल यानी एसआईटी को सौंप दी। बाद में एसआईटी से जुड़ी जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन के पास आ गई। जांच एजेंसी ने भर्ती प्रक्रिया, ओएमआर शीट के मूल्यांकन, मेरिट सूची तैयार करने और नियमों के पालन से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की। इस दौरान योगेश कुमार की भूमिका भी जांची गई। मामला पुराना होने के बावजूद जांच जारी रही और आखिरकार ईओडब्ल्यू ने उनके खिलाफ कार्रवाई की।
योगेश कुमार 30 जून 2014 को सेवानिवृत्त हुए थे। पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती की प्रक्रिया उसी वर्ष जून में पूरी हुई थी। यानी भर्ती प्रक्रिया उनके सेवानिवृत्त होने के आसपास पूरी हुई थी। बाद में इसी भर्ती में कथित अनियमितताओं को लेकर जांच शुरू हुई और उनके फैसलों की भूमिका पर सवाल उठे। सेवानिवृत्ति के बाद भी इस मामले की जांच जारी रही। जांच एजेंसी ने भर्ती से जुड़े फैसलों और नियमों के पालन की पड़ताल करते हुए योगेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की।
पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले की जांच में बड़ी कार्रवाई करते हुए ईओडब्ल्यू ने योगेश कुमार को लखनऊ के गोमतीनगर स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया। जांच एजेंसी के डीजी जय नारायण सिंह ने कहा कि भर्ती घोटाले में योगेश कुमार के खिलाफ साक्ष्य मिले हैं और जांच में उनकी भूमिका सामने आने के बाद गिरफ्तारी की गई। यह कार्रवाई वर्ष 2014 की भर्ती से जुड़े मामले में एक अहम घटनाक्रम है। जिस भर्ती प्रक्रिया में 1198 पदों के लिए चयन होना था, उसमें 1005 अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली थी। बाद में इसी प्रक्रिया पर अनियमितताओं के आरोप लगे और जांच के बाद पूर्व प्रमुख सचिव को गिरफ्तार किया गया।
योगेश कुमार की गिरफ्तारी ने पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती में कथित गड़बड़ियों को फिर चर्चा में ला दिया है। ओएमआर शीट के मूल्यांकन, मेरिट सूची तैयार करने और मंडलीय चयन समितियों के अधिकारों को लेकर उठे सवाल इस मामले के प्रमुख पहलू हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी के कार्यकाल में हुई भर्ती प्रक्रिया में इस तरह के आरोप सामने आना प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
योगेश कुमार का नाम वर्ष 2014 के पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती मामले में कथित अनियमितताओं और ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के कारण चर्चा में है। भर्ती प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन, ओएमआर शीट के मूल्यांकन और चयन से जुड़े फैसलों पर गंभीर आरोप लगे। जांच एजेंसी ने उनके खिलाफ साक्ष्य मिलने का दावा करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया। इस मामले ने योगेश कुमार के प्रशासनिक कार्यकाल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश के सभी आईएएस अधिकारियों की तुलना के बिना किसी एक अधिकारी को निश्चित रूप से सबसे भ्रष्ट कहना संभव नहीं है। फिलहाल योगेश कुमार की गिरफ्तारी और पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती में कथित गड़बड़ियों की जांच ही इस मामले के सबसे अहम पहलू हैं।
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