चार बच्चों के पिता ने रचाई चार बच्चों की मां से तीसरी शादी, ये इश्क नहीं आशां, समाज से बहिष्कार
UP News
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 02:15 AM
UP News : उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल स्थानीय समाज को हिला कर रख दिया, बल्कि आसपास के राज्यों की पंचायतों को भी सक्रिय कर दिया। यहां चार बच्चों के पिता ने, चार बच्चों की मां से तीसरी शादी रचा ली। इस प्रेम-प्रसंग के उजागर होते ही सामाजिक मान्यताओं की दीवारें हिल गईं, और अंतत: पंचायत ने कठोर निर्णय लेते हुए दोनों को समाज से बहिष्कृत कर दिया।
प्रेम, विवाह और विद्रोह का त्रिकोण
पूरा मामला सोनभद्र के विंढमगंज थाना क्षेत्र के धरती डोलवा गांव का है। यहां के रहने वाले संजय पासवान, जो पहले से दो विवाह कर चुके हैं और चार बच्चों के पिता हैं, ने गांव की विवाहित महिला ललिता देवी से मंदिर में तीसरी शादी कर ली। ललिता भी शादीशुदा हैं और उनके भी चार संतानें हैं। इस रिश्ते ने केवल दो परिवारों में हलचल नहीं मचाई, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी झकझोर दिया। शादी की खबर फैलते ही झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई गांवों की महापंचायत बुलाई गई।
महापंचायत का फैसला : समाज से बहिष्कार
झारखंड, बनारस समेत दर्जनों गांवों से आए बुजुर्गों, सामाजिक प्रतिनिधियों और ग्रामीणों की उपस्थिति में महापंचायत ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि संजय पासवान को समाज से बहिष्कृत किया जाए। पंचायत का कहना था कि, "एक व्यक्ति की स्वार्थपरक भावनाओं ने न केवल दो घरों को तबाह किया, बल्कि समाज के सामने गलत मिसाल पेश की है। ऐसे लोगों के लिए हमारी परंपरा में कोई स्थान नहीं।"
टूटे रिश्ते, बिखरे घर
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक प्रभावित हुए ललिता के पति महेंद्र पासवान, जिन्होंने दो दशक पहले ललिता से विवाह किया था। वे कहते हैं, "मेरे तीन बच्चे अब मेरे पास हैं, जबकि मेरी बेटी मां के साथ चली गई है। मैं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका हूं।" इधर संजय की दूसरी पत्नी मनीषा देवी महापंचायत में अपने बच्चों के भविष्य को लेकर फूट-फूटकर रोती रहीं। उन्होंने कहा, "मैंने हर हाल में उसका साथ दिया, लेकिन उसने मेरी दुनिया उजाड़ दी। मेरे बच्चों का क्या होगा?" यह कहते ही मनीषा मंच पर बेहोश होकर गिर पड़ीं, जिसके बाद पंचायत की बैठक में सन्नाटा पसर गया। UP News
प्रेम के आगे पंचायत बेबस?
हालांकि पंचायत ने समाज से बहिष्कार का फैसला सुना दिया है, लेकिन संजय और ललिता अपने निर्णय पर कायम हैं। तमाम सामाजिक दबाव, पुलिस हस्तक्षेप और पारिवारिक विरोधों के बावजूद दोनों साथ रहने की जिद पर अड़े हुए हैं। इस मामले ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक जिम्मेदारी से बड़ी हो सकती है? क्या एक व्यक्ति का प्रेम कई परिवारों के दुख का कारण बन सकता है? यह घटना सिर्फ एक गांव या दो परिवारों की नहीं, बल्कि उस सामाजिक संघर्ष का प्रतीक है जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक नैतिकता आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। यह कहानी प्रेम की कीमत पर बिखरते घरों और टूटते विश्वासों की भी है। UP News