बार-बार हारकर भी हार नहीं मानी, आईएफएस बन किया सपना पूरा
UP News
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 07:02 PM
UP News : यह कहानी अमरीश यादव की है, जिसने बार-बार असफल होने के बाद भी हार नहीं मानी और आखिर सफलता पा ही लिया। यूपी के एक छोटे जिले कासगंज से निकलकर उन्होंने वो कर दिखाया, जो लाखों युवा सिर्फ सपना देखते हैं। इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (आईएफएस) में चयन। वो भी तब, जब जीवन ने हर मोड़ पर ठोकर दी, समाज ने सवाल उठाए, रिश्तेदारों ने ताने दिए, और किस्मत ने छह बार मुंह मोड़ा। लेकिन कहते हैं न जिसे ठुकरा दे दुनिया, वो अक्सर इतिहास बनाते हैं।
शुरुआत एक सरकारी माहौल से
अमरीश का बचपन सरकारी वर्दियों के बीच बीता। दादा रेलवे में चीफ टीटीआई थे, पिता यूपी पुलिस में हेड कांस्टेबल, और परिवार के अन्य सदस्य भी सरकारी सेवाओं में कार्यरत। परिवार में एक आदर्श की तरह यह बात बैठा दी गई थी कि सरकारी नौकरी ही असली सफलता है। लेकिन अमरीश के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ रोटी-रोजगार नहीं थी, यह सेवा और पहचान का जरिया थी।
आईआईटी से आईएफएस तक का सफर
आईआईटी गुवाहाटी से बायोटेक्नोलॉजी में बीटेक करने वाले अमरीश के लिए कॉरपोरेट जॉब का रास्ता खुला था। लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि नेचर और समाज के करीब रहकर सेवा करना उनके लिए ज्यादा सार्थक है। यहीं से उनकी सिविल सेवा की यात्रा शुरू हुई।
छह बार असफलता, फिर भी अडिग विश्वास
2016 से 2023 तक उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी की। तीन बार यूपीएससी मेन तक पहुँचे, एक बार इंटरव्यू भी दिया, पर सफलता नहीं मिली। किसी और के लिए यह अंत होता, पर अमरीश ने इसे नया आरंभ बनाया।
आईएफएस का सपना और विज्ञान का सहारा
बायोटेक्नोलॉजी बैकग्राउंड की वजह से उन्होंने इंडियन फॉरेस्ट सर्विस को अपनी दिशा बनाई। विज्ञान, पर्यावरण और प्रकृति में गहरी रुचि ने उन्हें इस सेवा के लिए उपयुक्त बनाया। लेकिन पहली कोशिश में यहां भी सफलता नहीं मिली।
स्टेशन मास्टर की नौकरी, आर्थिक और आत्मिक संबल
2023 में रेलवे में स्टेशन मास्टर के रूप में चयन हुआ और एटा के मारेरा स्टेशन पर पोस्टिंग मिली। यह नौकरी अमरीश के लिए सिर्फ एक जॉब नहीं थी, बल्कि सम्मान और आत्मबल की वापसी थी। यह जिम्मेदारी उन्हें समय प्रबंधन और अनुशासन सिखाने लगी, जो आईएफएस की तैयारी के लिए वरदान साबित हुआ।
संघर्ष केवल परीक्षा का नहीं था, समाज से भी था
परिवार का साथ था, लेकिन समाज की आलोचना तीव्र थी। ताने मिलते थे—इतना पढ़कर क्या मिला?, प्राइवेट नौकरी कर लेता, शादी कर लेता। लेकिन अमरीश ने अपने भीतर की आवाज नहीं दबाई। वो जानते थे कि मंजिÞल पाने के लिए सब कुछ कुर्बान करना पड़ेगा।
कभी क्रिकेट खेलने वाले, दोस्तों के साथ फिल्में देखने वाले अमरीश ने तैयारी के दौर में सभी शौक छोड़ दिए। लेकिन मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए बांसुरी बजाना शुरू किया। यह संगीत उनकी आत्मा की शांति और नकारात्मकता से लड़ने का हथियार बना। UP News
दूसरे प्रयास में मिली मंजिल, और वो भी चमकदार
2024 में जब उन्होंने आईएफएस परीक्षा दी, यह उनका दूसरा इंटरव्यू था। और इस बार किस्मत भी उनकी मेहनत के सामने झुक गई। पूरे भारत में 72वीं रैंक लाकर उन्होंने अपने परिवार, जिले और हर संघर्षशील युवा का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया। UP News
अमरीश यादव का युवाओं को संदेश
कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। अगर आप ईमानदारी, धैर्य और निरंतर प्रयास के साथ जुटे रहें, तो सफलता आपको जरूर मिलेगी। कोचिंग मार्ग दिखाती है, लेकिन असली लड़ाई स्व-अध्ययन की होती है। हार मानना सबसे बड़ी हार है। UP News
टाइगर वाला सपना, एक अधूरा इरादा जो अब साकार होगा
अमरीश का सपना है एक दिन खुले जंगल में बाघ को अपनी आंखों से देखना। उनके लिए आईएफएस की सेवा सिर्फ एक नौकरी नहीं, प्रकृति से जुड़ने, पर्यावरण को बचाने और वनों के संरक्षण की जिम्मेदारी है। उन्हें भारत में फिर से चीता लाने की परियोजना ने बहुत प्रेरित किया है। अब वह खुद उस बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं। अमरीश यादव की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, हर उस युवा की कहानी है जो छोटी जगह से है, सीमित संसाधनों के साथ बड़ा सपना देखता है। उन्होंने दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो स्टेशन मास्टर से लेकर आईएफएस तक की यात्रा महज एक कहानी नहीं, एक क्रांति बन सकती है। UP News