उत्तर प्रदेश के गढ़ गंगा घाट में दीपदान कर नम आंखों से दी अपनों को श्रद्धांजलि
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 06:59 PM
उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले तिगरी मेले के दौरान दीपदान की प्राचीन परंपरा जीवंत होती दिखी। हजारों श्रद्धालु, दूर-दूर से आए, अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति और सुख-समृद्धि के लिए गढ़ गंगा घाट पर दीपक अर्पित करते रहे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान करने की यह परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है। UP News :
आकाश से उतरे तारे जैसी रोशनी
उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर में सूर्यास्त के समय घाट पर दीपदान का सिलसिला शुरू हुआ और रातभर जारी रहा। दीयों की मंद-मधुर रोशनी ने गंगा घाट को इस कदर जगमगा दिया मानो आकाश से तारे धरती पर उतर आए हों। श्रद्धालुओं के हाथों में दीपक, उनके मन में अपनों की याद और आंखों में आंसू बहुत भावनात्मक दृश्य उपस्थित कर रहा था।
दीपदान की ऐतिहासिक मान्यता
महाभारत के युद्ध में मारे गए असंख्य सैनिकों और योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम दीपदान किया था। तब से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। आज भी लोग अपने प्रियजनों की याद में दीपक जलाकर उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं। योगी सरकार ने इस गंगा मेले को राजकीय दर्जा भी प्रदान किया है, जिससे यह परंपरा और भी प्रभावशाली और व्यवस्थित रूप से मनाई जाती है।
श्रद्धालुओं की भावपूर्ण उपस्थिति
बीते मंगलवार की शाम हजारों श्रद्धालु घाट पर पहुंचे। कई श्रद्धालु अपने घर से दीपक, घी और अन्य पूजा सामग्री लाए। घाट पर ही पिंडदान, लौंग, बताशे और बांस की चटाई जैसी सामग्री उपलब्ध कराई गई थी। भक्तों ने न केवल दीपदान किया, बल्कि पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न किए। दीपक जलाते समय कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं, और वे अपने बिछड़े अपनों को याद करते हुए भाव-विभोर हो उठे।
सुरक्षा और व्यवस्थाएं
घाट पर विशेष सुरक्षा और व्यवस्थाओं का ध्यान रखा गया। ब्रजघाट पर ब्राह्मण और कर्मचारी श्रद्धालुओं की सहायता के लिए मौजूद थे। दीपदान की सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था थी, जिससे कोई परेशानी न हो। प्रशासन ने भी यातायात और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए। तिगरी मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक मिलन का भी अवसर बन गया है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु न केवल अपने परिजनों की याद में दीपदान करते हैं, बल्कि इस पर्व के माध्यम से आध्यात्मिक और मानसिक शांति भी प्राप्त करते हैं। दीयों की रोशनी में गंगा घाट पर छाई इस भावपूर्ण छटा ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस तरह, हापुड़ के गढ़मुक्तेश्वर का दीपदान महाभारत काल से चली आ रही परंपरा को जीवंत रखते हुए न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भावनाओं, संस्कृति और सामाजिक एकता का भी संदेश देता है। UP Newsउत्तर प्रदेश में अब रोजाना 12 घंटे काम, 3 दिन छुट्टी और ओवरटाइम का नया नियम लागू