नेता जी की मौत का बड़ा रहस्य खुलेगा, उत्तर प्रदेश की धरती से उठी मांग
UP News
उत्तर प्रदेश
RP Raghuvanshi
21 Dec 2024 10:08 PM
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RP Raghuvanshi
21 Dec 2024 10:08 PM
UP News : भारत की आजादी के महानायक सुभाष चन्द्र बोस (Subhash Chandra Bose) की मौत का बड़ा रहस्य जल्द ही खुल सकता है। उत्तर प्रदेश की धरती से नेताजी सुभाष चंद बोस की मौत के रहस्य के खुलासे की बड़ी मांग उठी है। उत्तर प्रदेश के रहने वाले लेखक तथा निर्देशक ने भारत सरकार को पत्र लिखकर नेता जी के मौत के रहस्य को उजागर करने का कारगर तरीका बताया है। उत्तर प्रदेश से उठी इस मांग को सभी देश भक्तों का समर्थन मिलने की भरपूर उम्मीद है। जो तरीका नेता जी की मौत के रहस्य के खुलासे के लिए बताया गया है। उस तरीके को उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे देश में तारीफ हो रही है।
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से उठी है बड़ी मांग
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रहने वाले तेजपाल सिंह धामा एक प्रसिद्ध लेखक तथा निर्देशक हैं। तेजपाल सिंह धामा उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा कस्बे के मूल निवासी हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में खेकड़ा में नीरा आर्य की स्मृति में एक बड़ा पुस्कालय भी स्थापि किया है। उत्तर प्रदेश में स्थापित नीरा आर्य मेमोरियल तथा पुस्तकालय की तरफ से श्री धामाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखा है। पत्र में मांग की गई है कि जापान में स्थित नेता जी सुभाष चंद बोस की अस्थियां भारत में लाकर उन अस्थियों की DNA जांच कराई जाए। उत्तर प्रदेश के रहने वाले प्रसिद्ध लेखक तेजपाल सिंह धामा का मानना है कि DNA जांच से नेता जी की मौत का बड़ा रहस्य आसानी से सुलझाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को क्या लिखा है?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र में तेजपाल सिंह धामा ने बहुत बड़ी जानकारी उद्घाटित की है। पत्र में लिखा गया है कि वर्ष 1948 में एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी इच्छाधारी नागिन, जिसके लेखक के तौर पर सूर्यकांत छद्म नाम अंकित किया गया था। 270 पेज के इस उपन्यास में आजाद हिन्द फौज, नीरा आर्य नागिन और उनके भाई बसंत की कहानी थी। हरेक घटनाक्रम तिथि, स्थान के साथ दर्शाया गया था। लेखक पहले ब्रिटिश सेना में थे, लेकिन बाद में आजादी की जंग में कूदने के कारण आईएनए ज्वाइन कर लिया था। उन्होंने लिखा है कि हवाई दुर्घटना में नेताजी नहीं मरे थे, नीरा आर्य के भाई बसंत कुमार आत्मबलिदान हुए थे। जापान के एक मंदिर में बसंत कुमार की अस्थियां हैं, न कि नेताजी की। नीरा आर्य की जासूसी की कई घटनाएं उसमें बहुत रोचक हैं।
लेखक के पौत्र ने बताया कि किसी ने इस पुस्तक के छपने पर 1951 में लेखक ही हत्या कर दी थी और बाजार से सारी पुस्तके चुन-चुनकर खरीदकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने नष्ट कर दी थी। लेखक के परिजनों को उसे आगे न छापने की हिदायत दी गई। लेखक के दो बेटों को भी हिन्दुस्तान छोड़कर विदेश में शरण लेनी पड़ी। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण में नीरा को उत्तर प्रदेश के खेकड़ा यानि कि तत्कालीन खेकड़ा संयुक्त प्रांत वासी और कई भाषाओं की जानकार बताया गया है। तेजपाल सिंह धामा ने भारत सरकार को पत्र लिखकर जापान के मंदिर से नेताजी सुभाष की अस्थियां सम्मान के साथ लाकर उनका DNA Test कराने की मांग की है। श्री धामा ने आशा व्यक्त की है कि DNA जांच से पूरा रहस्य सामने आ जाएगा।
महान स्वतंत्रता सेनानी तथा भारत की आजादी के महानायक हैं नेता जी सुभाष चन्द्र बोस
आपको पता ही है कि महान व्यक्तित्व कभी नहीं मरते। उनके नाम हमेशा अमर रहते हैं। ऐसे ही महानायक हैं नेता जी सुभाष चंद्र बोस। भारत के जन गण मन में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का नाम हमेशा अमर रहेगा। नेता जी के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ था।
महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस बड़े रहस्यमय व्यक्ति थे। उनमें अपने जीवनकाल में एक संप्रभु भारत को देखने का उत्साह और जुनून था। नेता जी स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेताओं में शुमार थे और 'नेताजी' कहलाए, मगर उनकी मृत्यु भी उतनी ही उलझन का विषय रही है। कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी थर्ड डिग्री बर्न के शिकार हो गए थे, जब उनका विमान ताइवान के ताइपे में उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जो उस समय जापान के कब्जे में था। द्वितीय विश्वयुद्ध में इंपीरियल जापानी सेना के पायलट, सह-पायलट और लेफ्टिनेंट जनरल सुनामासा शिदेई ने दावा किया कि जापान के आधिकारिक आत्मसमर्पण के तुरंत बाद उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। शिदेई और बोस डेरेन के रास्ते में थे, जहां बोस को यूएसएसआर के वार्ताकारों के साथ राजनीतिक शरण के बारे में बात करनी थी और भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए आजाद हिंद फौज (आईएनए) का नियंत्रण सोवियत संघ को सौंपना था। शिदेई को बोस के लिए मुख्य वार्ताकार के रूप में काम करना था। घायल या मृत बोस की कोई तस्वीर नहीं ली गई और न ही मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया गया। इन्हीं वजहों से आईएनए ने यह मानने से इनकार कर दिया कि उनका निधन हो गया। बोस के कई समर्थकों ने उनके निधन के समाचार और परिस्थितियों, दोनों पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। इसे साजिश बताते हुए कहा गया कि बोस के निधन के कुछ घंटों के भीतर कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी। नेताजी के बारे में कुछ मिथक आज भी कायम हैं। बोस के चीफ ऑफ स्टाफ कर्नल हबीब उर रहमान, जो उस दुर्भाग्यपूर्ण उड़ान में उनके साथ थे, बच गए। उन्होंने एक दशक बाद बोस के निधन पर गठित एक जांच आयोग में गवाही दी। कहा जाता है कि बोस की अस्थियां टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई हैं।
नेता जी के जीवन को लेकर है अटकलें
1940 के बाद से, जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस कलकत्ता (कोलकाता) में हाउस अरेस्ट से बच गए थे तो उनके ठिकाने के बारे में अफवाहें बढ़ीं। 1941 में जब वह जर्मनी में दिखाई दिए, तो उनके और उनकी व्यस्तताओं के बारे में तरह-तरह की अटकलें रहीं। उनको लेकर अटकलों और रहस्यों का सिलसिला विमान हादसे के बाद भी जारी रहा। विमान हादसे के बाद भी लंबे समय तक उनके जिंदा रहने की अफवाहें रह-रहकर उड़ती रहीं।
सन 1950 के दशक में कहानियां सामने आने लगीं कि बोस तपस्वी बन गए थे। इतिहासकार लियोनार्ड ए. गॉर्डन ने 1960 के दशक में इसे 'मिथक' बताया था। हालांकि बोस के कुछ सहयोगियों ने 'सुभाषवादी जनता' का गठन किया, जो इस कथा को बढ़ावा देने वाला एक संगठन था कि बोस उत्तर बंगाल के शौलमारी स्थित एक अभयारण्य में चले गए थे। कुछ रिपोर्ट स्पष्ट रूप से नेताजी की मृत्यु को स्थापित करती हैं। कहा गया कि मित्सुबिशी के-21 बमवर्षक विमान, जिस पर वह सवार थे, ताइपे में उड़ान भरने के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। भारत सरकार ने अब तक नेताजी की मृत्यु/लापता होने की तीन जांच कराई हैं। केवल पहले दो ने निष्कर्ष निकाला कि 18 अगस्त, 1945 को उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद ताइहोकू के एक सैन्य अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई, और यह भी कि टोक्यो में रेंकोजी मंदिर में नश्वर अवशेष उनके हैं। वे इस प्रकार हैं :
विमान दुर्घटना के बाद फैली अफवाहों के आलोक में लॉर्ड माउंटबेटन के नेतृत्व में दक्षिण-पूर्व एशिया के सुप्रीम एलाइड कमांड ने एक खुफिया अधिकारी कर्नल जॉन फिगेस को बोस की मौत की जांच करने का काम सौंपा।
5 जुलाई, 1946 को प्रस्तुत फिगेस की रिपोर्ट गोपनीय थी। 1980 के दशक में लियोनार्ड ए. गॉर्डन ने फिगेस का इंटरव्यू लिया था, जहां उन्होंने रिपोर्ट लिखने की पुष्टि की।
1997 में ब्रिटिश सरकार ने अधिकांश आईपीआई (इंडियन पॉलिटिकल इंटेलिजेंस) फाइलों को ब्रिटिश लाइब्रेरी में जनता के देखने के लिए उपलब्ध कराया। हालांकि, फिगेस की रिपोर्ट उनमें नहीं थी।
फिगेस की रिपोर्ट और गॉर्डन की जांच 4 बातों की पुष्टि करती है: 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू हवाईअड्डे (Taihoku Airport) के पास एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस सवार थे, बोस का उसी दिन पास के सैन्य अस्पताल में निधन हो गया। ताइहोकू में उनका अंतिम संस्कार किया गया और उसकी राख को टोक्यो (Tokyo) भेज दिया गया।
बोस के बारे में अफवाहों और विमान दुर्घटना की घटना पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से, 1956 में भारत की संप्रभु सरकार ने शाहनवाज खान की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की, जो उस समय संसद सदस्य थे। वह आजाद हिंद फौज में पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल थे।
इस समिति के अन्य अहम सदस्यों में एस एन मैत्रा, पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से नामित एक सिविल सेवक और नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस थे। इस समिति को 'नेताजी जांच समिति' भी कहा जाता है।
रहस्य बनी हुई है नेता जी की मौत
अप्रैल से जुलाई 1956 के बीच, इस समिति ने भारत, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में 67 गवाहों का बयान लिया, विशेष रूप से वे जो उस विमान दुर्घटना में बच गए थे और दुर्घटना से उनकी चोटों के निशान थे। गवाहों में ताइहोकू सैन्य अस्पताल के सर्जन डॉ. योशिमी शामिल थे, जिन्होंने अपने अंतिम घंटों में बोस का इलाज किया था और हबीबुर रहमान, जो विभाजन के बाद भारत छोड़कर चले गए थे।
दो-तिहाई समिति, यानी खान और मैत्रा ने कुछ मामूली विसंगतियों के बावजूद, निष्कर्ष निकाला कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू में विमान दुर्घटना में हुई थी।
सुरेश चंद्र बोस ने अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और यह दावा करते हुए असहमति का एक नोट लिखा कि शाहनवाज समिति के अन्य सदस्यों और कर्मचारियों ने जानबूझकर कुछ महत्वपूर्ण सबूतों को रोक दिया था और यह कि समिति को नेहरू द्वारा विमान दुर्घटना से मृत्यु का अनुमान लगाने के लिए निर्देशित किया गया था।
गोर्डन के मुताबिक, 181 पन्नों की रिपोर्ट में से सबूतों से निपटने का एक मुख्य सिद्धांत यह था कि अगर गवाहों की दो या दो से ज्यादा कहानियों में उनके बीच कोई विसंगति है, तो इसमें शामिल गवाहों की पूरी गवाही को खारिज कर दिया जाता है और झूठा मान लिया जाता है।
इसके आधार पर, बोस ने निष्कर्ष निकाला कि कोई दुर्घटना नहीं हुई थी, और उनके भाई अभी जीवित थे। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन के बड़े रहस्य से पर्दा उठाने के लिए तेजपाल सिंह धामा ने बड़ी पहल करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है।