
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पंचायत चुनाव इस बार महज़ गाँव की गलियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में बीजेपी के तीन बड़े सहयोगी—अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल, निषाद पार्टी के संजय निषाद और आरएलडी के अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी—ने गठबंधन से इतर अकेले दम पर ताल ठोकने का ऐलान कर दिया है। मोदी-योगी सरकार की गाड़ी में हिस्सेदार रहते हुए भी इन दलों का अलग राह पकड़ना न सिर्फ़ एनडीए के समीकरणों को चुनौती देता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि 2027 से पहले ही सत्ता साझेदारी की गांठें ढीली पड़ने लगी हैं। UP News
मेरठ में हुई अहम बैठक के बाद आरएलडी ने बड़ा दांव खेलते हुए ऐलान कर दिया कि पार्टी पंचायत चुनाव किसी भी गठबंधन के बिना लड़ेगी। जयंत चौधरी ने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के लिए पूरे प्रदेश में शक्ति-प्रदर्शन का रोडमैप तैयार कर लिया है—2 अक्टूबर को अलीगढ़ से आग़ाज़ और 31 अक्टूबर को सरदार पटेल जयंती पर बस्ती में समापन। आरएलडी का दावा है कि पंचायत चुनाव दरअसल गाँव-गाँव की नब्ज़ टटोलने और जमीनी संगठन की ताकत परखने का असली मैदान है। दिलचस्प यह है कि एनडीए का हिस्सा होते हुए भी आरएलडी का यह कदम यूपी की राजनीति में नए संकेत दे रहा है—क्या यह महज़ पंचायत चुनाव की रणनीति है या फिर 2027 के बड़े चुनाव से पहले गठबंधन की डोर कसने-ढीली करने का खेल शुरू हो चुका है? UP News
अपना दल (एस) की मुखिया और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल पहले ही साफ कर चुकी हैं कि पंचायत चुनाव में बीजेपी या किसी अन्य दल से तालमेल की कोई चर्चा नहीं हुई। उनका मानना है कि पार्टी को सिर्फ कुछ विधायकों की संख्या तक सीमित रखना उसके राजनीतिक विस्तार के साथ नाइंसाफी होगी। पंचायत चुनाव उनके लिए संगठन को गाँव-गाँव तक फैलाने और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का मौका है। अनुप्रिया पटेल इस चुनाव को सीधे 2027 के लिए ‘ट्रायल रन’ मान रही हैं। दरअसल, उनका संदेश साफ है—गठबंधन अपनी जगह है, लेकिन यूपी की राजनीति में अपना दल (एस) की ताकत अब पंचायत से लेकर विधानसभा तक अलग से गिनी जानी चाहिए।
योगी सरकार के कद्दावर कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने भी पंचायत चुनाव में ‘अकेला सफ़र’ तय कर दिया है। उनका कहना है कि वक्त आ गया है जब निषाद समाज की राजनीतिक ताक़त को सिर्फ़ सत्ता में साझेदारी तक सीमित न रखकर हर बूथ और हर गाँव में पहचान दिलाई जाए। संजय निषाद इस पंचायत चुनाव को 2027 की ओर बढ़ने वाली निर्णायक सीढ़ी मानते हैं और साफ़ संकेत देते हैं कि निषाद पार्टी अब अपनी ताक़त बीजेपी के सहारे नहीं, बल्कि अपने झंडे के नीचे परखना चाहती है। सवाल यह भी है कि क्या यह कदम गठबंधन की गांठ कसने की रणनीति है या फिर 2027 से पहले बीजेपी को ताक़त का अहसास कराने का दबाव? UP News
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पंचायत चुनाव दलों के लिए महज़ सत्ता की सीढ़ी नहीं, बल्कि अपने-अपने वोट बैंक की असली परीक्षा होती है। उत्तर प्रदेश की ज़्यादातर विधानसभा सीटें गाँवों से आती हैं और वहीं से तय होती है 2027 की सियासी बाज़ी। यही कारण है कि जाटों के सहारे जयंत चौधरी, कुर्मियों की ताक़त पर अनुप्रिया पटेल और निषाद समाज की पकड़ से संजय निषाद—तीनों ही अपने-अपने समाज में पैठ गहरी करने में जुट गए हैं। पंचायत चुनाव इनके लिए ऐसा अखाड़ा बन गया है, जहां से बीजेपी के साथ भविष्य की सौदेबाज़ी की कीमत तय होगी। साफ है कि ये छोटे दल बूथ-स्तर की जीत से सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव में बड़ा दांव खेलना चाहते हैं। UP News
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। एनडीए के तीनों सहयोगियों का अलग-अलग मैदान में उतरना बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकता है, क्योंकि इससे मतों के बिखराव का खतरा साफ़ दिख रहा है। विपक्ष, ख़ासकर समाजवादी पार्टी, इस दरार को हथियार बनाकर गाँव-गाँव तक ‘गठबंधन की दरकती दीवार’ का शोर मचा सकती है। सियासी विश्लेषकों का मानना है कि अगर अनुप्रिया, संजय निषाद और जयंत चौधरी की पार्टियाँ पंचायत चुनाव में उम्मीद से बेहतर नतीजे निकाल लेती हैं तो 2027 के विधानसभा चुनाव में वे बीजेपी से सीटों के बँटवारे पर दबाव बना सकती हैं। मगर अगर समीकरण उलटे पड़े, तो फायदा कम और नुकसान ज़्यादा हो सकता है—यानी सहयोगियों का यह ‘एकला चलो’ कहीं एनडीए की मुश्किलें बढ़ाने वाला ‘बूमरैंग’ न साबित हो जाए। UP News