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उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर आरक्षण व्यवस्था में एक बड़ा और निर्णायक बदलाव होने जा रहा है। इस बार ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर OBC आरक्षण अब ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले’ के आधार पर तय किया जाएगा।

UP News : उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर आरक्षण व्यवस्था में एक बड़ा और निर्णायक बदलाव होने जा रहा है। इस बार ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर OBC आरक्षण अब ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले’ के आधार पर तय किया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार ने एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है, जो पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक, तथ्यपरक और कानूनी मानकों के अनुरूप सुनिश्चित करेगा। वर्ष 2021 के चुनावों में जहां आरक्षण का निर्धारण रैपिड सर्वे के आधार पर किया गया था, वहीं इस बार पूरी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरूप बनाया जा रहा है। बता दें कि 2023 के नगर निकाय चुनावों में इस फॉर्मूले का पहली बार सफल परीक्षण किया गया था, जिसे अब पंचायत स्तर पर भी अनिवार्य रूप से लागू किया जा रहा है। UP News
‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’ सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया एक महत्वपूर्ण और सख्त कानूनी मानक है, जिसका उद्देश्य स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण को पूरी तरह आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर सुनिश्चित करना है। इसे पहली बार 2010 के के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ मामले में और बाद में 2021 के विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले में स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया गया था। इस व्यवस्था के तहत राज्य सरकार किसी भी स्थानीय निकाय चुनाव में OBC आरक्षण लागू करने से पहले तीन जरूरी चरणों को पूरा करने के लिए बाध्य होती है, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, संतुलित और संवैधानिक रूप से मजबूत बनी रहे। सबसे पहले, राज्य सरकार को एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना होता है, जो जमीनी स्तर पर सामाजिक और राजनीतिक पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करता है। इसके बाद, आयोग द्वारा एकत्र किए गए अनुभवजन्य और वास्तविक आंकड़ों के आधार पर आरक्षण का प्रतिशत तय किया जाता है, ताकि निर्णय अनुमान नहीं बल्कि ठोस डेटा पर आधारित हो। अंत में यह सुनिश्चित किया जाता है कि SC, ST और OBC वर्गों को मिलाकर कुल आरक्षण किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से अधिक न जाए। UP News
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण तथा स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था दोनों पूरी तरह अलग प्रकृति की हैं। इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह व्यवस्था दी कि राजनीतिक आरक्षण केवल अनुमान या पुराने आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि ताजा और प्रमाणिक डेटा के आधार पर ही तय किया जाए।दरअसल, अदालत का मानना है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए सरकार के पास अद्यतन और ठोस आंकड़े होना बेहद जरूरी है, ताकि आरक्षण का लाभ सही और वास्तविक पात्र वर्गों तक पहुंच सके। इसी उद्देश्य से ‘ट्रिपल टेस्ट’ को अनिवार्य किया गया है, जो पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और संवैधानिक रूप से मजबूत बनाता है। नियमों के अनुसार यदि कोई राज्य सरकार इस प्रक्रिया का पालन किए बिना या आयोग की रिपोर्ट के बिना आरक्षण तय करती है, तो संबंधित OBC आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी की सीट माना जाएगा और चुनाव उसी आधार पर कराए जाएंगे। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश सरकार अब इस पूरी व्यवस्था को कानूनी ढांचे और तय मानकों के अनुसार लागू करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रही है। UP News
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा गठित किए जा रहे समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल छह माह निर्धारित किया गया है। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेजी से अंतिम रूप दिया जा रहा है, जिसके तहत उम्मीद है कि मई के अंत तक या जून के पहले सप्ताह में सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी।यह आयोग जमीनी स्तर पर पहुंचकर पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति का विस्तृत अध्ययन करेगा और उसके सामाजिक प्रभावों का निरंतर आकलन करता रहेगा। जिन क्षेत्रों में OBC वर्ग से संबंधित विश्वसनीय और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, वहां विशेष सर्वेक्षण के जरिए नई डेटा रिपोर्ट तैयार की जाएगी। UP News
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