उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव में दसवीं सीट पर घमासान तेज है। 37 वोटों की जरूरत, सपा के उम्मीदवार और बागी विधायकों का गणित क्या कहता है, जानें पूरी कहानी।

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुंच रहा है, जहां विधानसभा का सामान्य संख्या बल राजनीतिक रणनीति के सामने चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। 16 अक्टूबर को होने वाले चुनाव में नौ सीटों के परिणाम का गणित काफी हद तक साफ दिखाई देता है, लेकिन दसवीं सीट ने भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच असली राजनीतिक मुकाबले की जमीन तैयार कर दी है। राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से प्रत्येक सीट जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत है। यही 37 का आंकड़ा इस समय भाजपा, सपा और उनके सहयोगी दलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संख्या बन गया है।
मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर भाजपा सात सीटें निकालने की स्थिति में है और सपा दो सीटों पर मजबूत दिखाई देती है। चुनाव आयोग ने यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान निर्धारित किया है। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है। यहीं से दसवीं सीट का सवाल पैदा होता है। भाजपा के पास सात सीटें निकालने के बाद भी अतिरिक्त विधायक बचते हैं। आठवीं सीट के लिए उसे 37 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए सहयोगी दलों, निर्दलीय अथवा अन्य विधायकों और संभावित क्रॉस वोटिंग की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी तरफ सपा भी अपने दो प्रत्याशियों के बाद तीसरी सीट के लिए संख्या जुटाने की संभावनाएं तलाश रही है। सपा ने आज प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को प्रत्याशी बनाया है, जबकि तीसरे उम्मीदवार का नाम अभी सामने नहीं आया है।
राज्यसभा का यह चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां हर विधायक का वोट महत्वपूर्ण है और कुछ अतिरिक्त वोट पूरे समीकरण को बदल सकते हैं। मौजूदा राजनीतिक गणित में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास संख्या की बड़ी बढ़त है। मीडिया रिपोर्ट ने NDA के पक्ष में 289 और सपा नेतृत्व वाले खेमे के पक्ष में 103 वोटों का उल्लेख किया था। हालांकि इन कुल आंकड़ों के बावजूद दसवीं सीट के लिए जरूरी 37-37 वोटों की अलग-अलग उम्मीदवारवार गणित महत्वपूर्ण रहेगी। यही कारण है कि इस चुनाव में छोटे दलों और ऐसे विधायकों की भूमिका अचानक बढ़ गई है, जिनका राजनीतिक रुख किसी एक खेमे के साथ पूरी तरह स्थिर दिखाई नहीं देता।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2024 का राज्यसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय भाजपा ने अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर मुकाबला खड़ा किया था और अंततः भाजपा के सभी आठ उम्मीदवार जीत गए थे, जबकि सपा के दो उम्मीदवार ही निर्वाचित हो सके थे। उस चुनाव में सपा के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग भी चर्चा में रही थी। इसलिए 2026 के चुनाव में केवल विधानसभा की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दल यह भी देख रहे हैं कि मतदान के दिन कौन विधायक किसके पक्ष में मतदान करता है।
सपा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वह अपनी दो सीटों के बाद तीसरी सीट के लिए आवश्यक संख्या कैसे जुटाएगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी तीसरी सीट के लिए भी संभावनाएं तलाश रही है। संभावित नामों को लेकर पूर्व नौकरशाह आलोक रंजन और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी सहित कई नामों की चर्चा सामने आई है, लेकिन अभी तीसरे उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यदि सपा सहयोगी खेमे के कुछ विधायकों, छोटे दलों अथवा स्वतंत्र रुख रखने वाले विधायकों का समर्थन जुटाने में सफल होती है तो मुकाबला कागज पर दिखाई देने वाले सामान्य गणित से कहीं अधिक दिलचस्प हो सकता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ ऐसे विधायक पहले भी राज्यसभा चुनाव के दौरान अपने दल के आधिकारिक रुख से अलग मतदान कर चुके हैं। 2024 के राज्यसभा चुनाव में मनोज कुमार पांडेय, राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह के मतदान को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। उस समय इन विधायकों के रुख ने सपा के सामने अतिरिक्त उम्मीदवार को जिताने की चुनौती को और कठिन बनाया था। 2026 में इन्हीं तरह के पुराने राजनीतिक समीकरणों पर फिर निगाहें टिकना स्वाभाविक है। हालांकि इस बार कौन विधायक किसके पक्ष में मतदान करेगा, इसका अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी।
भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में कई छोटे दल शामिल हैं। इनमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसे सहयोगी दल भी हैं। राज्यसभा चुनाव में गठबंधन का औपचारिक संख्या बल एक बात है और प्रत्येक विधायक का वास्तविक मतदान व्यवहार दूसरी बात। यदि किसी सहयोगी दल के विधायक अपने दल के राजनीतिक नेतृत्व से अलग रुख अपनाते हैं तो इसका असर उम्मीदवार की 37 वोटों वाली गणित पर पड़ सकता है। इसी तरह विपक्षी खेमे में भी यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि क्या सभी विधायक पार्टी के घोषित प्रत्याशी के पक्ष में एकजुट रहते हैं।
इस चुनाव को केवल राज्यसभा की दस सीटों का चुनाव मानना अधूरा होगा। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में 16 अक्टूबर का राज्यसभा चुनाव राजनीतिक दलों के लिए संगठन, गठबंधन और विधायकों पर पकड़ की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी है। यही कारण है कि भाजपा और सपा दोनों इस चुनाव को गंभीरता से ले रहे हैं।
राज्यसभा चुनाव की खासियत यही है कि यहां चुनाव मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों की संख्या और विधानसभा का सामान्य बहुमत अंतिम परिणाम की पूरी कहानी नहीं बताते। 37 वोटों का आंकड़ा सामने है। भाजपा के पास अपना मजबूत संख्या बल और गठबंधन है। सपा के पास अपने विधायकों के साथ सहयोगी और अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती है। लेकिन इसके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मतदान के दिन का होगा—
इन सभी सवालों का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है।
राज्यसभा चुनाव के इस पूरे गणित को चेतना मंच के वरिष्ठ सहयोगी शिव ओम उपाध्याय ने एक बेहद रोचक प्रतीक के माध्यम से समझाया है। एक ही पेड़ पर खिले दो फूलों में एक लाल है और दूसरा बिल्कुल सफेद। जब दोनों कलियां बंद थीं, तब बाहर से देखकर कोई यह नहीं बता सकता था कि खुलने के बाद इनमें से कौन-सा फूल किस रंग का होगा। राजनीति भी कुछ ऐसी ही है। चुनाव से पहले संख्या दिखाई देती है, समीकरण दिखाई देते हैं, गठबंधन दिखाई देते हैं और दावे दिखाई देते हैं। लेकिन मतदान के दिन राजनीतिक परिस्थितियां किस रूप में सामने आएंगी, यह हमेशा पहले से पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता। उत्तर प्रदेश की दसवीं राज्यसभा सीट का चुनाव भी फिलहाल कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। नौ सीटों का गणित काफी हद तक स्पष्ट है, लेकिन दसवीं सीट के फूल का रंग अभी बंद कली जैसा है। 16 अक्टूबर को मतदान होगा और उसी दिन पता चलेगा कि 37 वोटों की इस राजनीतिक पहेली का अंतिम उत्तर क्या निकलता है।
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