चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश स्तर पर निगरानी के लिए तीन-तीन विभागीय कमेटियां गठित थीं, फिर भी आरोप है कि आउटसोर्सिंग एजेंसी ने अयोग्य उम्मीदवारों को नियुक्त कर दिया। अब प्रकरण उजागर होते ही विभाग में जवाबदेही तय करने, फाइलों की परतें खोलने और कड़ी कार्रवाई की तैयारी तेज हो गई है।

UP News : उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण विभाग की मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत चल रही आईएएस–पीसीएस मुफ्त कोचिंग अब भर्ती विवाद के केंद्र में आ गई है। उत्तर प्रदेश के कोर्स कोऑर्डिनेटर चयन में कथित खेल का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभाग की पात्रता जांच और दस्तावेज सत्यापन वाली व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार किया है। चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश स्तर पर निगरानी के लिए तीन-तीन विभागीय कमेटियां गठित थीं, फिर भी आरोप है कि आउटसोर्सिंग एजेंसी ने अयोग्य उम्मीदवारों को नियुक्त कर दिया। अब प्रकरण उजागर होते ही विभाग में जवाबदेही तय करने, फाइलों की परतें खोलने और कड़ी कार्रवाई की तैयारी तेज हो गई है।
सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के हर जिले में ₹60 हजार मासिक मानदेय पर एक-एक कोर्स कोऑर्डिनेटर की नियुक्ति करते हुए कुल 69 पद भरे गए। चयन की बुनियादी शर्त यह तय थी कि अभ्यर्थी ने पीसीएस की मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण की हो। लेकिन आरोप है कि इन 69 में से करीब 48 नियुक्तियां ऐसी रहीं, जिनमें उम्मीदवार निर्धारित अर्हता पर खरे नहीं उतरे, फिर भी उन्हें हरी झंडी दे दी गई। यह पूरी भर्ती प्रक्रिया लगभग दो साल पहले पूरी हो चुकी थी, लेकिन अब जब उत्तर प्रदेश में फाइलें खुलने लगीं और रिकॉर्ड की परतें उधड़ीं, तो चयन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी संख्या में अयोग्य नियुक्तियां आखिर किसकी अनदेखी और किसकी सहमति से संभव हो पाईं।
उत्तर प्रदेश में आउटसोर्सिंग के जरिए होने वाली भर्तियों को पारदर्शी और नियमसम्मत रखने के लिए विभाग ने अर्हता तय करने, दस्तावेज़ों की जांच और साक्षात्कार जैसी अहम प्रक्रियाओं की निगरानी हेतु तीन अलग-अलग विभागीय कमेटियां गठित की थीं। पहली कमेटी में संयुक्त निदेशक आर.के. सिंह के साथ डीएसडब्ल्यूओ पवन यादव समेत अन्य अधिकारियों के नाम सामने आए, दूसरी में संयुक्त निदेशक एस.के. विसेन, डीएसडब्ल्यूओ अनामिका सिंह और डीएसडब्ल्यूओ शिवम सागर शामिल बताए गए, जबकि तीसरी कमेटी में उप निदेशक सुनीता यादव सहित अन्य अधिकारियों की भूमिका बताई जा रही है। यही कमेटियां उत्तर प्रदेश में चयन प्रक्रिया को फिल्टर करने वाली थीं ताकि कोई अपात्र उम्मीदवार सिस्टम के भीतर न घुस सके। लेकिन अब विभागीय गलियारों में चर्चा है कि निगरानी का यह ढांचा कागज़ों तक सिमट गया और मैदान एजेंसी के भरोसे छोड़ दिया गया। आरोप है कि इसी ढील ने कथित गड़बड़ी के लिए रास्ता खोल दिया, और अब सवाल यह है कि जब कमेटियां थीं, तो जांच का चेक-पोस्ट खाली कैसे रह गया?
भर्ती प्रक्रिया को लेकर अब उत्तर प्रदेश में आरोपों का सीधा टकराव सामने आ गया है। चयन में शामिल आउटसोर्सिंग कंपनी अवनि परिधि एनर्जी एंड कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप है कि उसने मनमाने ढंग से चयन सूची तैयार कर दी और पात्रता की शर्तों को दरकिनार कर दिया। वहीं विभागीय स्तर पर कई अधिकारी पूरी जिम्मेदारी एजेंसी पर डालते नजर आ रहे हैं। दूसरी तरफ एजेंसी का दावा है कि चयन प्रक्रिया में विभागीय अफसरों की भागीदारी और अनुमोदन के बिना कोई सूची अंतिम नहीं हो सकती। मामला उजागर होने के बाद अब समाज कल्याण विभाग में आउटसोर्सिंग के जरिए हुई नियुक्तियों की विस्तृत जांच कराने की बात सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक जल्द ही नई जांच कमेटी गठित की जा सकती है, जो यह तय करेगी कि दस्तावेज सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने में किस स्तर पर चूक हुई। इसी जांच के आधार पर उत्तर प्रदेश में कई अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्रवाई की तलवार लटकती मानी जा रही है।
कोर्स कोऑर्डिनेटर भर्ती में गड़बड़ी के आरोपों के बाद अब उत्तर प्रदेश में समाज कल्याण विभाग की कंप्यूटर ऑपरेटर भर्ती को लेकर भी शिकायतें सामने आ रही हैं। आरोप है कि वहां भी अभिलेखों का सही ढंग से सत्यापन नहीं किया गया। विभागीय स्तर पर माना जा रहा है कि जांच शुरू होते ही इन नियुक्तियों की भी फाइलें खंगाली जा सकती हैं। UP News