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उत्तर प्रदेश में एक से बढक़र एक अचरज भरे स्थल मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश के अचरज भरे स्थलों में ही शामिल है अनोखी मोहब्बत की एक निशानी। उत्तर प्रदेश में स्थापित अनोखी मोहब्बत की इस निशानी की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है।

UP News : उत्तर प्रदेश में एक से बढ़कर एक अचरज भरे स्थल मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश के अचरज भरे स्थलों में ही शामिल है अनोखी मोहब्बत की एक निशानी। उत्तर प्रदेश में स्थापित अनोखी मोहब्बत की इस निशानी की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। कहा तो यह भी जाता है कि उत्तर प्रदेश में मौजूद अनोखी मोहब्बत की इस निशानी के जैसा कोई दूसरा उदाहरण पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता है। UP News
यह मोहब्बत की खास निशानी उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में स्थापित है। आप सोच रहे होंगे कि हम आगरा के ताजमहल की बात कर रहे हैं। हम ताजमहल से भी अनोखी ईमारत की यहां बात कर रहे हैं। ताज नगरी के नाम से प्रसिद्ध उत्तर प्रदेश के आगरा शहरा में ही स्थापित है ऐतिहासिक स्थल ‘‘64 खंभा’’। उत्तर प्रदेश का यह स्थल पिता तथा पुत्र की खास मोहब्बत की बहुत बड़ी निशानी है। उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में स्थापित ‘‘64 खंभा’’ में एक पिता तथा पुत्र की कब्र एक साथ मौजूद है। इस प्रकार का दूसरा उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलता है। उत्तर प्रदेश के इस स्थल को देखने के लिए बहुत कम पर्यटक आते हैं। UP News
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के आगरा में ताजमहल और आगरा किला जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारतों के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक स्मारक भी मौजूद है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह स्मारक है ‘चौसठ खंभा’ यानी 64 खंभों वाला मकबरा, जो मुगलकालीन स्थापत्य कला और इतिहास की अनोखी मिसाल माना जाता है। यह मकबरा मुगल बादशाह शाहजहां के दौर से जुड़ा हुआ है और इसके साथ कई रहस्यमयी व ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। स्थानीय लोग इसे "64 खंभा" के नाम से जानते हैं, जबकि इतिहास में इसे सलावत खान का मकबरा कहा जाता है। UP News
इतिहासकारों के अनुसार सलावत खान मुगल साम्राज्य में एक बड़े पद पर तैनात था। वह शाहजहां का मीर बख्शी यानी शाही खजांची और सेना से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकारी था। उसके पिता सादिक खान भी जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में प्रभावशाली दरबारी रहे थे। बताया जाता है कि सलावत खान की हत्या आगरा किले के दीवान-ए-आम में राजपूत योद्धा अमर सिंह राठौर ने कर दी थी। यह घटना उस समय पूरे मुगल दरबार में सनसनी बन गई थी। बाद में सलावत खान की याद में यह भव्य मकबरा बनवाया गया। UP News
इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसके 64 विशाल खंभे हैं। लाल बलुआ पत्थर से बने इन खंभों के कारण ही इसे "चौसठ खंभा" कहा जाने लगा। मकबरे का निर्माण मुगल स्थापत्य शैली में किया गया था और कभी इसके आसपास चारबाग, फव्वारे और खूबसूरत बागीचे हुआ करते थे। इतिहासकार बताते हैं कि यह इमारत अपने समय में बेहद भव्य हुआ करती थी। हालांकि समय के साथ इसका बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और अब केवल मुख्य ढांचा ही बचा है। UP News
सलावत खान के मकबरे के बिल्कुल पास उसके पिता सादिक खान का मकबरा भी मौजूद है। यह मकबरा अष्टकोणीय आकार में बना हुआ है और मुगलकालीन वास्तुकला का शानदार उदाहरण माना जाता है। सादिक खान जहांगीर के शासनकाल में पंजाब का गवर्नर भी रहा था। इतिहासकारों के मुताबिक सादिक खान का मकबरा 1633 से 1635 के बीच बनवाया गया था। इसकी खास बात यह है कि मकबरे के अंदर वास्तविक कब्र दिखाई नहीं देती, जिससे इसे लेकर कई रहस्य भी जुड़े हुए हैं। UP News
आगरा आने वाले अधिकांश पर्यटक ताजमहल और आगरा किला देखने तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन इतिहास प्रेमियों के लिए यह "64 खंभा" किसी खजाने से कम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्मारक का सही तरीके से संरक्षण और प्रचार किया जाए तो यह भी आगरा का बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है। पुरातत्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है, लेकिन समय-समय पर इसके रखरखाव को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। आगरा का यह चौसठ खंभा केवल एक मकबरा नहीं, बल्कि मुगलकाल की राजनीति, सत्ता संघर्ष और स्थापत्य कला की जीवंत कहानी भी है। आज भी यह ऐतिहासिक धरोहर सैकड़ों साल पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए खड़ी है और लोगों को मुगल दौर की याद दिलाती है। UP News
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