रामनगरी अयोध्या का बदला रूप आज पूरे उत्तर प्रदेश के बदलते चेहरे का प्रतीक बन गया है, जहां धार्मिक आस्था के साथ–साथ सड़क, एयरपोर्ट, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के नए अवसर तेजी से आकार ले रहे हैं।

UP News : 6 दिसंबर 1992… उत्तर प्रदेश की राजनीति और आस्था, दोनों की यादों में यह तारीख आज भी दर्ज है। बाबरी ढांचे के गिरने वाले उस दिन को तीन दशक से ज़्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन भगवान राम की नगरी अयोध्या में लोगों की आंखों के सामने आज भी वही दृश्य घूम जाते हैं। 33 साल बाद भी स्थानीय लोगों से लेकर उस दौर के रामभक्त कारसेवक तक 6 दिसंबर के हर पल को ऐसे बयान करते हैं, मानो कल ही की बात हो।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में रहने वाले बुज़ुर्ग बताते हैं कि 6 दिसंबर 1992 की उस सुबह मठ–मंदिरों में घड़ियाल, घंटे और शंखनाद ने जैसे माहौल बदल दिया था। शहर में पहले सामान्य हलचल थी, लेकिन कुछ ही देर में सरयू के घाटों से लेकर राम मंदिर परिसर तक जय श्री राम के नारे गूंजने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, तब उत्तर प्रदेश के अलग–अलग ज़िलों से आए कारसेवक सरयू जल और मिट्टी को आशीर्वाद मानकर विवादित ढांचे की ओर बढ़ चले। कुछ घंटों में ही जनसैलाब इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि पूरा इलाका कारसेवकों से भर गया। स्थानीय लोगों की मानें तो “जहां नजर जाती, सिर्फ केसरिया गमछे और जय श्री राम के नारे ही दिखते–सुनाई देते थे।”
अयोध्या की पुरानी बस्ती में रहने वाली मधु (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उत्तर प्रदेश के कोने–कोने से उस दिन लोग अचानक अयोध्या पहुंचने लगे थे। “गलियों से, छतों के रास्ते, सड़कों से लोग आ रहे थे। चारों तरफ ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे गूंज रहे थे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि संभालना मुश्किल हो गया। ढांचा गिरने लगा तो अफरा–तफरी भी मची, कई कारसेवक भागते–दौड़ते दिखाई दिए। अयोध्या तब कैसी थी और आज कैसी है, यह फर्क सिर्फ एक पीढ़ी में साफ दिखता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ढांचे के गिरने के बाद घर–घर देसी घी के दीये जलाए गए, अस्थायी ढांचे में रामलला की प्रतिमा स्थापित की गई और यही सिलसिला आगे चलकर भव्य मंदिर के निर्माण तक पहुंचा। अयोध्या के ही संन्यासी संजय दास कहते हैं कि 6 दिसंबर 1992 का दिन उत्तर प्रदेश की स्मृति में एक “कठिन और खौफनाक मोड़” के रूप में दर्ज है। वे कहते हैं “उस दिन जो कुछ हुआ, उसने पूरे उत्तर प्रदेश और देश की दिशा बदल दी। आज वही स्थल दिव्य और भव्य राम मंदिर के रूप में पूरी शान के साथ खड़ा है। दुनिया के कोने–कोने से सनातन धर्म के श्रद्धालु उत्तर प्रदेश की अयोध्या पहुंच रहे हैं, रामलला के दर्शन कर भाव–विभोर हो रहे हैं। बरसों पुराना विवाद न्यायपालिका और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिये इतिहास बन चुका है, और उसकी जगह अब आस्था, पर्यटन और विकास की नई कहानी लिखी जा रही है। रामनगरी अयोध्या का बदला रूप आज पूरे उत्तर प्रदेश के बदलते चेहरे का प्रतीक बन गया है, जहां धार्मिक आस्था के साथ–साथ सड़क, एयरपोर्ट, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के नए अवसर तेजी से आकार ले रहे हैं।
राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे बजरंग दल के संस्थापक और भाजपा के फायर ब्रांड नेता विनय कटियार भी 6 दिसंबर 1992 की घटना को आज अलग अंदाज में याद करते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे कटियार का कहना है कि उस दिन को वे “सिर्फ विध्वंस” के रूप में नहीं देखते। उनके मुताबिक,1992 में वहां कोई साधारण इमारत नहीं थी, हमारी भावनाओं पर खड़ा एक ढांचा था। हमने फूंक मारी और वह गिर गया। अगर उस समय उस इमारत को नहीं हटाया जाता, तो कई लोग उसके मलबे में दब सकते थे। आज वहां जो भव्य मंदिर खड़ा है, वह आने वाले सौ साल तक इसी तरह खड़ा रहेगा। हालांकि उस दौर में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा भीड़ को नियंत्रण में लाने के लिए गोली चलाए जाने की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए वे बताते हैं कि उस दौर में उत्तर प्रदेश की सड़कों पर कई रामभक्तों ने अपनी जान कुर्बान की, लेकिन कारसेवा स्थल पर ढांचे के ठीक पास किसी की शहादत नहीं हुई। असल टकराव और संघर्ष बाद में भड़का, जब माहौल पूरी तरह उग्र हो चुका था। अयोध्या और उसके आसपास के कस्बों में रहने वाले लोग आज भी उस समय को याद करते हैं तो कहते हैं – सड़कें आंदोलन के रणक्षेत्र बन गई थीं और हर मोड़ पर ‘जय श्री राम’ के नारे के साथ आंसू, श्रद्धा और संघर्ष एक साथ दिखाई देते थे। अयोध्या और आसपास के कस्बों में रहने वाले कई बुज़ुर्ग कहते हैं कि 6 दिसंबर का नाम आते ही आज भी बदली हुई हवा के बावजूद भीतर से सिहरन सी दौड़ जाती है। उनकी नजर में यह दिन एक तरफ 500 वर्षों के संघर्ष की याद दिलाता है तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में बदले राजनीतिक–सामाजिक परिदृश्य की कहानी भी सुनाता है। लोगों का कहना है कि कारसेवकों के संघर्ष को शब्दों में बयान करना आसान नहीं, उत्तर प्रदेश के गांव–गांव में उस समय जो लहर उठी थी, उसने आने वाले दशकों की राजनीति की दिशा तय कर दी और आज जब राम मंदिर बनकर खड़ा है, तो सबसे पहले 1992 में कारसेवा करने वाले उन राम भक्तों की याद आती है, जिन्होंने उस आंदोलन की अगुवाई की। UP News