उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई जिला इकाइयों और नामित पार्षदों की सूची सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे संगठनात्मक मंथन के बाद जारी की गई इस सूची ने पार्टी को मजबूती देने के बजाय कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई जिला इकाइयों और नामित पार्षदों की सूची सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे संगठनात्मक मंथन के बाद जारी की गई इस सूची ने पार्टी को मजबूती देने के बजाय कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिन चेहरों को जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जिनका अतीत विवादों, आपराधिक मामलों या राजनीतिक असहजता से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की यह सूची अब महज संगठन विस्तार का दस्तावेज नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की गंभीरता और पारदर्शिता पर उठते सवालों का केंद्र बन गई है।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में शिवेंद्र सिंह को जिला महामंत्री बनाए जाने के फैसले के बाद पार्टी के भीतर असहमति खुलकर सामने आने लगी है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हों, उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी किस आधार पर सौंपी गई। इसी तरह उत्तर प्रदेश के इटावा में जितेंद्र गौड़ को महामंत्री बनाए जाने पर भी विवाद गहरा गया है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि उनका एक पुराना वीडियो पहले भी विवादों में रह चुका है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का आरोप लगा था। ऐसे में उत्तर प्रदेश भाजपा की नियुक्तियों पर पार्टी की राजनीतिक संवेदनशीलता और आंतरिक अनुशासन दोनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जिला कार्यकारिणी की एक नियुक्ति ने अलग तरह का विवाद खड़ा कर दिया है। चिंतामणि पांडेय को मीडिया प्रभारी बनाए जाने पर आपत्ति इसलिए उठ रही है क्योंकि वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षक बताए जाते हैं। सरकारी सेवा से जुड़े नियम साफ कहते हैं कि कोई भी सरकारी कर्मचारी सक्रिय राजनीतिक पद नहीं संभाल सकता। ऐसे में उत्तर प्रदेश में भाजपा की यह नियुक्ति केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियमों की अनदेखी का मामला भी बनती दिख रही है। विरोधी इसे नियमों के दोहरे इस्तेमाल की मिसाल बता रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक चुनाव के दौरान भाजपा ने अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की बात जोर-शोर से कही थी। लेकिन अब जब सूची सामने आई है, तो कई जिलों में यही दावा कटघरे में नजर आ रहा है। आरोप हैं कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों में महिलाओं की भागीदारी तय अपेक्षाओं से काफी कम रखी गई है। कुछ जगहों पर उनका प्रतिनिधित्व 25 प्रतिशत से भी नीचे बताया जा रहा है, जबकि कई जिलों में यह आंकड़ा 10 से 15 प्रतिशत तक सीमित होने की चर्चा है। इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या उत्तर प्रदेश में सामाजिक संतुलन और समावेशी संगठन की बात केवल कागजों तक ही सिमट गई।
उत्तर प्रदेश के जालौन में चयन प्रक्रिया को लेकर पक्षपात और नियमों की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं। वहीं आगरा, अलीगढ़, मुरादाबाद, बरेली और हरदोई जैसे जिलों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच असंतोष की खबरें हैं। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक विस्तार के नाम पर कुछ खास चेहरों को तरजीह दी गई, जबकि जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। राजनीतिक रूप से इतने अहम राज्य उत्तर प्रदेश में अगर संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर केवल अंदरूनी बैठकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका संदेश कार्यकर्ताओं के मनोबल तक जाता है।
केवल जिला इकाइयों की सूची ही नहीं, उत्तर प्रदेश में जारी नामित पार्षदों की सूची भी गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला मामला अलीगढ़ से सामने आया है, जहां विपिन चंचल को पार्षद नामित किए जाने पर हैरानी जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि वह पिछले करीब छह महीनों से लापता हैं और उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट भी थाने में दर्ज है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में नामित पार्षदों की सूची के सत्यापन और चयन की प्रक्रिया पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। इसी तरह बस्ती में नामित पार्षद दीपक चौहान को लेकर भी विवाद सामने आया है। उन पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज होने की बात कही जा रही है। इससे विपक्ष को भाजपा पर हमला बोलने का मौका मिल गया है, वहीं पार्टी के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सूची तैयार करते समय क्या बुनियादी जांच-पड़ताल भी नहीं की गई।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नामित पार्षदों की सूची को लेकर एक और आरोप सामने आया है। कहा जा रहा है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र से पांच पार्षद नामित कर दिए गए, जबकि एक ही वार्ड से कई नामों को जगह दिए जाने की भी चर्चा है। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक संतुलन और व्यापक प्रतिनिधित्व की बजाय कुछ पसंदीदा लोगों को प्राथमिकता दी गई। अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो इससे पार्टी की चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर असर पड़ना तय है। UP News