भाजपा ने पहली बार अपने संगठन में एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए तय किए हैं। महिला भागीदारी बढ़ाने की दृष्टि से यह फैसला राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, मगर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यही फार्मूला अब संगठन के लिए नई चुनौती बनता नजर आ रहा है।

UP News : उत्तर प्रदेश सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी इस समय अपने संगठनात्मक ढांचे को नई धार देने में जुटी है, लेकिन जिला कमेटियों के गठन के दौरान एक ऐसा समीकरण सामने आ गया है, जिसने पार्टी पदाधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। भाजपा ने पहली बार अपने संगठन में एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए तय किए हैं। महिला भागीदारी बढ़ाने की दृष्टि से यह फैसला राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, मगर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यही फार्मूला अब संगठन के लिए नई चुनौती बनता नजर आ रहा है।
प्रदेश के 94 संगठनात्मक जिलों में नई जिला कार्यकारिणियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। 21 सदस्यीय कमेटी में सात महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। कागज पर यह व्यवस्था जितनी प्रभावशाली दिखाई देती है, जमीन पर उसे लागू करना उतना आसान नहीं पड़ रहा। खासकर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय, मजबूत और जिम्मेदारी निभाने वाली महिला कार्यकर्ताओं की तलाश ने पर्यवेक्षकों और जिला स्तर के नेताओं की मुश्किल बढ़ा दी है। कई जिलों में सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि तय मानक के मुताबिक ऐसे चेहरों का चयन कैसे हो, जो संगठन से जुड़ाव भी रखते हों और नेतृत्व की भूमिका निभाने में सक्षम भी हों।
भाजपा की कोशिश है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं को केवल चुनावी समर्थन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि संगठन की निर्णायक भूमिका में भी आगे लाया जाए। वर्ष 2023 में लागू नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद पार्टी अब उसी सोच को अपने संगठनात्मक ढांचे में उतारती दिखाई दे रही है। सदन में 33 फीसदी आरक्षण की नीति को आगे बढ़ाते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जिला इकाइयों के गठन में भी महिला भागीदारी को अनिवार्य बना दिया है। इसी उद्देश्य से जिला स्तर पर पर्यवेक्षकों को विस्तृत दिशानिर्देश दिए गए। चयन प्रक्रिया में किन लोगों से राय लेनी है, किस आयु वर्ग को प्राथमिकता देनी है, सामाजिक और राजनीतिक संतुलन कैसे बनाना है इन सभी बिंदुओं के साथ सबसे महत्वपूर्ण शर्त यही रखी गई कि हर जिला कार्यकारिणी में सात महिलाओं को शामिल करना होगा।
उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों, नगर इकाइयों और महानगरों में महिला पदाधिकारियों के नाम जुटाना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है, लेकिन ग्रामीण जिलों में स्थिति अलग है। वहां सक्रिय, अनुभवी और संगठन के साथ लगातार जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं की संख्या सीमित बताई जा रही है। यही वजह है कि कई जिलों में महिला प्रतिनिधित्व का लक्ष्य पूरा करना जिला संगठन और पर्यवेक्षकों के लिए कठिन हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में लंबे प्रयास के बाद भी सात ऐसे नाम तय नहीं हो सके हैं, जिन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त माना जा सके। इस कारण जिला कमेटियों की सूची को अंतिम रूप देने में देरी की स्थिति भी बन रही है।
उत्तर प्रदेश भाजपा के अंदरूनी फीडबैक से यह भी संकेत मिले हैं कि रायशुमारी की प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नेताओं ने अधिकतर पुरुष कार्यकर्ताओं के नाम ही आगे बढ़ाए हैं। इससे साफ है कि संगठन के निचले ढांचे में अब भी पुरुषों की पकड़ ज्यादा मजबूत बनी हुई है। महिला भागीदारी बढ़ाने का राजनीतिक संदेश तो साफ है, लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत यह बता रही है कि संगठनात्मक संरचना में इस बदलाव को लागू करने के लिए अभी काफी मेहनत करनी होगी। कई जिलाध्यक्षों का मानना है कि महिलाओं को आगे लाने का फैसला सकारात्मक है, लेकिन उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में जहां स्थानीय राजनीति अब भी पुरुष प्रधान ढांचे में चलती है, वहां अचानक पर्याप्त संख्या में प्रभावशाली महिला चेहरे खोजना आसान नहीं है।
इस बदलाव का असर सिर्फ महिला प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश भाजपा में लंबे समय से जिला कमेटियों में जगह पाने की उम्मीद लगाए बैठे पुरुष कार्यकर्ताओं के बीच भी बेचैनी बढ़ी है। एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए तय होने से कई पुराने और सक्रिय पुरुष चेहरों की दावेदारी कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में संगठन के भीतर हल्की असहजता और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ती दिख रही हैं। पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार के इस नए मॉडल से सामाजिक संतुलन तो मजबूत होगा, लेकिन इसके साथ स्थानीय स्तर पर असंतोष को संभालना भी नेतृत्व के लिए बड़ी जिम्मेदारी होगी।
जानकारी यह भी है कि उत्तर प्रदेश के कई जिलाध्यक्षों और पर्यवेक्षकों ने अपनी व्यावहारिक दिक्कतें प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचाई हैं। पार्टी की मंशा महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की है और इस दिशा में वह पीछे हटती नहीं दिख रही, लेकिन जिन जिलों में ज्यादा परेशानी आ रही है वहां मानकों में सीमित लचीलापन या सूची फाइनल करने के लिए अतिरिक्त समय देने जैसे विकल्पों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि इतना तय माना जा रहा है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में महिला प्रतिनिधित्व के सवाल को केवल औपचारिक निर्णय के रूप में नहीं देख रही। पार्टी इसे आने वाले राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक संदेश से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है। UP News