केशव प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह और भूपेंद्र चौधरी के बाद सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी की कमान अब ओबीसी (Other Backward Classes) के किस समाज के हाथ में सौंपी जाएगी और वह सूबे के बदलते राजनीतिक समीकरण में कितने फिट बैठेंगे।

UP News : उत्तर प्रदेश की सियासत इस समय भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर अटकी हुई है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक इस बात पर मंथन चल रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में बीजेपी अगला चेहरा किस जाति और किस नेता को बनाएगी। केशव प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह और भूपेंद्र चौधरी के बाद सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी की कमान अब ओबीसी (Other Backward Classes) के किस समाज के हाथ में सौंपी जाएगी और वह सूबे के बदलते राजनीतिक समीकरण में कितने फिट बैठेंगे।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी संगठन की कमान संभाल रहे प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में उत्तर प्रदेश बीजेपी में बड़े बदलाव की तैयारी लगभग फाइनल मानी जा रही है। राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष हाल ही में उत्तर प्रदेश का दौरा कर लौटे और उन्होंने आरएसएस, सरकार व संगठन के जिम्मेदार नेताओं से लंबी चर्चा के बाद दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। राजनीतिक गलियारों में यह संदेश साफ पढ़ा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी जल्दी ही नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर सकती है। पूरी प्रक्रिया की निगरानी उत्तर प्रदेश के प्रभारी पीयूष गोयल और सह–प्रभारी विनोद तावड़े कर रहे हैं, इसलिए उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में उत्सुकता और बढ़ गई है कि इस बार बीजेपी किस चेहरे पर दांव लगाएगी।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के केंद्र की राजनीति में आने के बाद से उत्तर प्रदेश में बीजेपी संगठन की कमान लगातार ओबीसी समाज के हाथ में रही है। पहले मौर्य समाज से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया। उनके बाद कुर्मी समुदाय से स्वतंत्र देव सिंह को प्रदेश की बागडोर सौंपी गई, जिनके नेतृत्व में 2019 लोकसभा चुनाव लड़ा गया। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समाज से आने वाले भूपेंद्र चौधरी को अध्यक्ष बनाया गया। यानी उत्तर प्रदेश बीजेपी ने पिछले एक दशक में मौर्य, कुर्मी और जाट ओबीसी की तीन बड़ी जातियों को संगठनात्मक नेतृत्व देकर गैर–यादव ओबीसी वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश की है। अब चर्चा यह है कि उत्तर प्रदेश में इस पैटर्न की अगली कड़ी कौन बनेगा।
उत्तर प्रदेश की सियासत में बीजेपी का फोकस शुरुआत से गैर–यादव ओबीसी पर रहा है। मौर्य और कुर्मी समाज की बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी इन्हीं जातियों से प्रदेश अध्यक्ष दे चुकी है। जाट समाज को प्रतिनिधित्व देकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समीकरण भी साधने की कोशिश हुई। अब पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में संगठन की कमान एक बार फिर किसी ओबीसी चेहरे को ही मिल सकती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के ओबीसी समाज में लोधी, निषाद और पाल समुदाय सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, क्योंकि ये समुदाय सूबे के सियासी गणित में लगातार अपना वजन बढ़ा रहे हैं।
इन ओबीसी चेहरों के अलावा उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष की रेस में जिन नामों की फुसफुसाहट है, उनमें अमरपाल मौर्य,अशोक कटारिया,विद्या सागर सोनकर,पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा का नाम भी लिया जा रहा है। ये सभी नेता अलग–अलग क्षेत्रों और जातीय समूहों में अपनी पकड़ रखते हैं, इसलिए उत्तर प्रदेश में अंतिम निर्णय लेते समय पार्टी नेतृत्व को क्षेत्रीय संतुलन, ब्राह्मण–दलित–ओबीसी समीकरण और 2027 के रोडमैप जैसे कई पहलुओं पर नजर रखनी होगी।
उत्तर प्रदेश में लोध वोटर कई जिलों में पांच से दस फीसदी तक की हिस्सेदारी रखते हैं। रामपुर, अमरोहा (ज्योतिबा फुले नगर), बुलंदशहर, अलीगढ़, हापुड़–महेन्द्रगढ़/महामायानगर (अब हाथरस), आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जैसे जिलों में लोध समाज का मजबूत वोट बैंक उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए हमेशा अहम रहा है। वहीं, मल्लाह–निषाद समुदाय गंगा और प्रमुख नदियों के किनारे बसे जिलों – जैसे फतेहपुर, चंदौली, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, वाराणसी, गोरखपुर, भदोही, प्रयागराज, अयोध्या, जौनपुर, औरैया आदि – में प्रभावी भूमिका निभाता है। नाव चलाने और मछली पकड़ने के पारंपरिक पेशे से जुड़े ये समुदाय उत्तर प्रदेश की राजनीति में “किंगमेकर” की भूमिका निभा सकते हैं और किसी भी दल का खेल बनाने–बिगाड़ने की ताकत रखते हैं। UP News