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उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव-2027 में होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए कुछ ही महीनों का समय बचा है। इस बीच प्रदेश के सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारी में जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव से पहले हर किसी को उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास को जानने की दिलचस्पी है।

UP News : उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव-2027 में होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए कुछ ही महीनों का समय बचा है। इस बीच प्रदेश के सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारी में जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव से पहले हर किसी को उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास को जानने की दिलचस्पी है। इसी मकसद से हम यहां उत्तर प्रदेश के इतिहास को केन्द्र में रखते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत कर रहे हैं। UP News
उत्तर प्रदेश में अब तक 32 बार मुख्यमंत्री शपथ ले चुके हैं। वर्ष-2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव के बाद 33वीं बार मुख्यमंत्री शपथ लेंगे। 32 बार शपथ ले चुके मुख्यमंत्रियों में कुल 21 नेता मुख्यमंत्री बने हैं। अनेक नेता एक तथा दो बार से अधिक बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर तैनात रहे हैं। उत्तर प्रदेश का गठन 24 जनवरी 1950 को हुआ था। उत्तर प्रदेश के नाम से पहले उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत के नाम से जाना जाता था। संयुक्त प्रांत के आखिरी मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत थे। उत्तर प्रदेश में विधानसभा का पहला चुनाव होने से पहले तक गोबिंद बल्लल पंत ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। उत्तर प्रदेश में विधानसभा का पहला चुनाव 1951 में हुआ था। उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले चुनाव में कांग्रेस ने 388 सीट जीतकर शानदार जीत दर्ज की थी। इस जीत के बाद पंडित गोबिंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। वर्ष-1954 में गोबिंद बल्लभ पंत को हटाकर डॉ. संपूर्णानंद को उत्तर प्रदेश का दूसरा मुख्यमंत्री बनाया गया। UP News
उत्तर प्रदेश विधानसभा का दूसरा चुनाव वर्ष-1957 में हुआ था। इस चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की थी। इस जीत के बाद एक बार फिर डॉ. संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस बार वें उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री बने थे। इस दौरान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता कमलापति त्रिपाठी तथा चन्द्रभानु गुप्ता के बीच भारी विवाद चल रहा था। इस विवाद के कारण डॉ. संपूर्णानंद को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से हटाकर चन्द्रभानु गुप्ता को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया। चन्द्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश के चौथे मुख्यमंत्री थे किन्तु वें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने वाले तीसरे नेता थे। UP News
वर्ष-1962 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का तीसरा चुनाव हुआ। उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा के इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 249 सीटों के साथ पहले से खराब प्रदर्शन किया। हालांकि उनकी सरकार बन गई और मुख्यमंत्री के तौर पर गुप्ता ने अपना कार्यकाल जारी रखा। लेकिन 1963 में गुप्ता को गद्दी से हटा दिया गया और उनकी जगह सुश्री सुचित्रा कृपलानी को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन किया गया। 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 199 सीटें जीती और बहुमत से कुछ सीटों से चूक गई। जबकि भारतीय जनसंघ को 98 सीटें मिली। देश के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर दी और अपनी अलग पार्टी, भारतीय क्रांति दल बना ली। जिसके बाद समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया, राजनारायण और नानाजी देशमुख की भारतीय जनसंघ की मदद से चौधरी चरण सिंह अप्रैल 1967 में उत्तर प्रदेश के 5वें मुख्यमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) जिस मोर्चे के प्रमुख बने थे उसका नाम था संयुक्त विधायक दल और इसमें सीपीआईएम जैसी वामपंथी और भारतीय जनसंघ जैसी दक्षिणपंथी पार्टी भी शामिल थी। अलग- अलग विचारधाराओं की पार्टियों के एक साथ आने से गठबंधन में बहुत सारी उलझनें सामने आईं और फरवरी 1968 में यह गठबंधन टूटने के कारण चरण सिंह ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद राज्य में 1 साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा। UP News
वर्ष-1969 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चौथा चुनाव हुआ। 1969 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर राज्य की सत्ता में वापसी की और राज्य के एक बार फिर मुख्यमंत्री बने चंद्र भानु गुप्ता। हालांकि पार्टी में 1 साल में ही बिखराव हो गया और जिसके बाद गुप्ता को एक बार फिर मुख्यमंत्री की पद से इस्तीफा देना पड़ा और चौधरी चरण सिंह की सत्ता में फिर से वापसी हो गई। हालांकि 1 महीने के अंदर ही इस सरकार में बहुत सारी दिक्कतें सामने आने लगी और चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के 14 मंत्रियों का इस्तीफा मांग लिया। बता दें कि इन मंत्रियों का नेतृत्व कर रहे थे वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलापति त्रिपाठी और उन्होंने मुख्यमंत्री की बात न मान कर इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसी के चलते एक बार फिर चरण सिंह को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और राज्य में 17 दिन का राष्ट्रपति शासन लग गया। कुछ दिन के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर 1970 में राज्य में कांग्रेस (O), जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांति दल द्वारा एक संयुक्त विकास दल का गठन किया गया और इसने कांग्रेस (O) के Tribhuvan Narain Singh को अपना नेता चुना और वो उत्तर प्रदेश के 6वें मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद कमलापति त्रिपाठी 4 अप्रैल 1971 को उत्तर प्रदेश के 7वें मुख्यमंत्री बनते हैं। 1973 के प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी विद्रोह के चलते 12 जून 1973 को उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया था। त्रिपाठी की कुर्सी जाने के बाद एक बार फिर राज्य में 148 दिनों का राष्ट्रपति शासन लग जाता है। नवंबर 1973 में हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के 8वें मुख्यमंत्री बने हालांकि आपातकाल के दौरान संजय गांधी के साथ मतभेद के चलते उनकी जगह एनडी तिवारी को राज्य का 9वां मुख्यमंत्री बना दिया गया। UP News
1977 में देश में आपातकाल खत्म होने के बाद लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई थी और इसी के मद्देनजर कई पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी नाम की एक पार्टी बनाई थी। लोकसभा चुनाव के बाद देश की सत्ता में जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई की सरकार काबिज हुई और उसने जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी उनको भंग कर दिया था। जिसके बाद जून 1977 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव हुए उसमें जनता पार्टी ने 425 में से बंपर 352 सीटें जीत ली और राम नरेश यादव राज्य के 10वें मुख्यमंत्री बने। देवरिया में 1979 में पुलिस द्वारा बर्बरता की गई। जिसके कारण यादव को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है। और फरवरी 1979 में बनारसी दास राज्य के 11वें मुख्यमंत्री बने। 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार देश में बनी और सरकार आने के बाद उत्तर प्रदेश की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। मई 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत होती है। जिसके बाद राज्य के 12वें मुख्यमंत्री वी.पी. सिंह बने। वीपी सिंह के कार्यकाल के दौरान उनकी सरकार पर फर्जी पुलिस एनकाउंटर के आरोप लगते है। साथ ही बहुत सी दूसरी घटनाएं भी होती हैं। जिसमें 1981 का बहमई नरसंहार भी शामिल होता है। साथ ही 1982 में वीपी सिंह के भाई और इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस चंद्रशेखर प्रसाद सिंह की डकैत हत्या कर देते हैं और इसी कारण वीपी सिंह की कुर्सी चली जाती है। जिसके बाद राज्य के 13वें मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्रा बनाए गए। कुछ ही समय बाद 1984 में श्रीपति मिश्रा की जगह एनडी तिवारी को बैठा दिया जाता है। 1984 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी एनडी तिवारी के नेतृत्व में लड़ती है। जिसमें उसको शानदार जीत मिली थी। हालांकि 1985 में राजीव गांधी ने एन.डी. तिवारी को मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया और वीर बहादुर सिंह को राज्य की कमान सौंप दी। जून 1988 में एक बार फिर एन.डी. तिवारी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया। UP News
1989 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव एक मजबूत नेता के रूप में उभर कर आते हैं। जिसके चलते देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह के बदले जनता दल उनको मुख्यमंत्री रूप में चुनती है और भारतीय जनता पार्टी की मदद से उनकी सरकार बन गई। अक्टूबर 1990 में जब रथ यात्रा के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी लालू यादव के नेतृत्व वाली बिहार सरकार करती है तो बीजेपी केंद्र के साथ-साथ यूपी सरकार से भी अपना समर्थन वापस ले लेती है। हालांकि कांग्रेस के समर्थन के चलते हैं मुलायम सिंह अपनी सरकार बचा लेते हैं। लेकिन कुछ दिन बाद कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद उनकी कुर्सी चली जाती है। मंडल की राजनीति को काउंटर करने के लिए बीजेपी ने 1991 के चुनाव में OBC लोधा समुदाय से आने वाले कल्याण सिंह को अपना मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया। जिससे पार्टी को यूपी विधानसभा में 425 से 221 सीटें मिली और कल्याण सिंह राज्य के 16वें मुख्यमंत्री बने। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिर गया जिसके बाद उत्तर प्रदेश के साथ 3 और बीजेपी शासित सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। UP News
1993 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिलकर चुनाव लड़ती हैं। मुलायम और कांशीराम के साथ आने से 422 विधानसभा सीटों में से सपा को 109 और बीएसपी को 67 सीटें मिलती हैं। इससे मुलायम दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बनते हैं। करीब 2 साल तक यह सरकार चलती है लेकिन मई 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती और मुलायम सिंह यादव एक दूसरे के कट्टर विरोधी बन जाते हैं और यह सरकार गिर जाती है। बता दें कि गेस्ट हाउस कांड में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया था। गेस्ट हाउस कांड के बाद भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देती है और मायावती राज्य की पहली दलित मुख्यमंत्री बनती हैं। 1996 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 174 सीटें मिलती हैं और वह कुछ सीटों से बहुमत से चूक जाती है। जिसके बाद राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लग जाता है। अप्रैल 1997 में बीएसपी और बीजेपी 6-6 महीने वाले मुख्यमंत्री के फॉर्मूले के साथ आते हैं। पहले 6 महीने के लिए मायावती राज्य की मुख्यमंत्री बनती हैं। 6 महीने के बाद बीजेपी की बारी आती है और कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया जाता है। लेकिन कुछ दिन बाद ही मायावती अपना समर्थन वापस ले लेती हैं। हालांकि बीजेपी ,बीएसपी और कांग्रेस के कुछ बागी विधायकों के समर्थन से अपनी सरकार बचा लेती है। इस बीच 21 फरवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी भाजपा सरकार को बर्खास्त कर देते हैं और जगदंबिका पाल राज्य के नए मुख्यमंत्री बन जाते हैं। हालांकि इस फैसले को कल्याण सिंह इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देते हैं और 23 फरवरी को एक बार फिर वो मुख्यमंत्री बन जाते हैं। 1998 के आम चुनाव में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी 85 लोकसभा सीट में से 58 पर जीतती है। लेकिन 1999 में यह आंकड़ा सिर्फ 29 रह जाता है। कल्याण सिंह के खिलाफ हो रही गुटबाजी के बीच भारतीय जनता पार्टी राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री की कुर्सी में बैठाती है। बता दें कि इसी सरकार में जाटों को ओबीसी का दर्जा मिला था। बीजेपी में अपनी दावेदारी कमजोर होते देख कल्याण सिंह भारतीय जनता पार्टी को छोड़ देते हैं। जिसके बाद 2000 में राजनाथ सिंह यूपी के अगले मुख्यमंत्री बनते हैं। UP News
मार्च 2002 से मई 2002 के बीच उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू रहता है। जिसके बाद 2002 में चुनाव होते हैं। जिसमें 403 सीटों में से समाजवादी पार्टी को 143, बीएसपी को 98, कांग्रेस को 25 और भारतीय जनता पार्टी को 88 सीटें मिलती हैं। बीजेपी के समर्थन से मायावती राज्य की तीसरी बार मुख्यमंत्री बनती हैं। हालांकि सरकार बनने के बाद बीजेपी के कुछ नेता मायावती के खिलाफ प्रचार करने लगते हैं। इसी के चलते मायावती मुख्यमंत्री के पद इस्तीफा दे देती हैं। 29 अगस्त 2003 को बीएसपी के बागियों के समर्थन से मुलायम सिंह यादव तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बनते हैं। ऐसा माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी मुलायम सिंह की सरकार चलाने में मदद की थी और यह सरकार 2007 तक चलती है। 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होते हैं और सोशल इंजीनियरिंग के चलते ब्राह्मणों के सपोर्ट से 1991 के बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता है और बीएपी को मिली 206 सीटों के चलते मायावती राज्य की चौथी बार मुख्यमंत्री बनती हैं। बीएपी को मिले ब्राह्मणों के समर्थन की सबसे खास वजह सतीश मिश्रा को माना जाता है। 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को मायावती और सतीश मिश्रा एक बार फिर 2022 के चुनाव में भी आजमा रहे हैं। UP News
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा 403 में से 224 सीटें मिलती है। विधानसभा चुनाव होने के बाद मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव राज्य के 20वें मुख्यमंत्री बनते हैं। बता दें कि अखिलेश यादव केवल 38 साल की कम उम्र में राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करती है और चुनाव में यह गठबंधन पूरी तरह से फैल हो जाता है। जिसके कारण सपा सत्ता से बाहर हो जाती है। भारतीय जनता पार्टी को 403 में से 312, समाजवादी पार्टी को 47, बीएसपी को 18 और कांग्रेस को 7 सीटें मिलती हैं। शानदार जीत के बाद बीजेपी गोरखनाथ मंदिर के महंत और सांसद योगी आदित्यनाथ को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाती है। वर्ष-2017 से वर्ष-2022 तक योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में हिन्दू हृदय सम्राट के साथ ही बुल्डोजर बाबा की छवि बना ली। इसी छवि के आधार पर वर्ष-2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने शानदार जीत दर्ज कर ली। इस बार फिर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव वर्ष-2027 की तैयारी चल रही है। यह देखना बहुत ही दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा? UP News
मुख्यमंत्री का नाम कब से कब तक पार्टी का नाम
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