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अगर केंद्र सरकार की प्रस्तावित योजना पर सहमति बनती है, तो उत्तर प्रदेश में 2029 के लोकसभा चुनाव से सांसदों की सीटों की संख्या बढ़ सकती है, जबकि 2032 के विधानसभा चुनाव तक विधायकों की सीटों में भी बड़ा इजाफा देखने को मिल सकता है।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति आने वाले वर्षों में एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। अगर केंद्र सरकार की प्रस्तावित योजना पर सहमति बनती है, तो उत्तर प्रदेश में 2029 के लोकसभा चुनाव से सांसदों की सीटों की संख्या बढ़ सकती है, जबकि 2032 के विधानसभा चुनाव तक विधायकों की सीटों में भी बड़ा इजाफा देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही महिला आरक्षण को प्रभावी तरीके से लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम होने के संकेत मिल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए जरूरी संवैधानिक और कानूनी बदलावों पर विचार कर रही है। इसी क्रम में सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस विषय पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई जा सकती है, ताकि सभी दलों के सुझाव लेकर आगे की रणनीति तय की जा सके।
यदि सरकार के प्रस्ताव पर आम राय बनती है, तो सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य पर पड़ सकता है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं, लेकिन नई योजना के तहत इन्हें बढ़ाकर 120 किए जाने की संभावना जताई जा रही है। ऐसी स्थिति में इनमें से करीब 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। इस बदलाव का मतलब यह होगा कि उत्तर प्रदेश की संसदीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत रूप में सामने आएगी। इससे प्रदेश की चुनावी रणनीति, दलों की टिकट नीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व तीनों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा की मौजूदा 403 सीटों को भी बढ़ाकर 603 किए जाने की चर्चा है। अगर ऐसा होता है, तो इनमें से लगभग 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए सामाजिक और प्रतिनिधिक संतुलन की शुरुआत कर सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में सीटों की संख्या बढ़ने से क्षेत्रीय संतुलन, जनप्रतिनिधित्व और चुनावी प्रतिस्पर्धा का नया ढांचा तैयार होगा। महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने से राजनीतिक दलों को भी अपने संगठन और नेतृत्व संरचना में बदलाव करना पड़ सकता है।
बैठक में शामिल नेताओं के हवाले से यह बात सामने आई है कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन और नई जनगणना के अंतिम नतीजों का लंबा इंतजार नहीं करना चाहती। चर्चा इस बात पर भी हुई कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इस सोच के पीछे एक बड़ा राजनीतिक कारण भी माना जा रहा है। कई राज्यों में लंबे समय से यह आशंका जताई जाती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को परिसीमन के बाद सीटों के बंटवारे में नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में पुरानी जनगणना के आधार पर आगे बढ़ने का रास्ता उन राज्यों की चिंताओं को कुछ हद तक कम कर सकता है।
सरकार की सोच केवल सामान्य सीटों तक सीमित नहीं है। प्रस्तावित ढांचे में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सीटों में भी उसी अनुपात में महिला आरक्षण लागू करने पर विचार किया जा रहा है। यानी आरक्षण का दायरा व्यापक हो सकता है और इसका असर उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश की सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राजनीति पर दिखाई दे सकता है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार की व्यापक योजना में लोकसभा की कुल 543 सीटों को बढ़ाकर 816 तक किए जाने का प्रस्ताव भी शामिल है। इनमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। यदि यह मॉडल लागू होता है, तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसी अनुपात में सीटों का पुनर्गठन संभव माना जा रहा है।
अगर यह पूरा प्रस्ताव अमल में आता है, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का चरित्र बदल सकता है। अब तक जातीय, क्षेत्रीय और दलगत समीकरणों के आधार पर चुनावी रणनीति बनाने वाले दलों को महिला नेतृत्व को केंद्र में रखकर नई राजनीतिक जमीन तैयार करनी होगी। प्रदेश में नए निर्वाचन क्षेत्र बन सकते हैं, पुराने समीकरण टूट सकते हैं और महिला प्रतिनिधित्व का नया अध्याय शुरू हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में सीटें बढ़ने और महिला आरक्षण लागू होने से चुनावी मुकाबले का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। इससे न सिर्फ विधानसभा और लोकसभा चुनाव अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे, बल्कि प्रदेश की राजनीति में नए चेहरों के उभरने की संभावना भी बढ़ेगी।
फिलहाल केंद्र सरकार इस पूरे मसले पर सहयोगी दलों और विपक्ष से बातचीत कर रही है। अगर व्यापक सहमति बन जाती है, तो संसद के मौजूदा बजट सत्र में या फिर किसी विशेष सत्र के जरिए कानून में जरूरी संशोधन लाए जा सकते हैं। इसके बाद महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में औपचारिक कदम बढ़ाए जा सकते हैं। कुल मिलाकर, आने वाले समय में उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में फिर चर्चा के केंद्र में हो सकता है। UP News
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