महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि भाषा के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति की जा रही है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महाराष्ट्र की सरकार के खिलाफ बड़ा हमला बोला है। अखिलेश यादव ने यह हमला मुंबई में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य किए जाने को लेकर बोला है। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि भाषा के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति की जा रही है। महाराष्ट्र सरकार की ओर से सार्वजनिक परिवहन से जुड़े चालकों के लिए मराठी के व्यावहारिक ज्ञान की शर्त लागू की गई है। इसके तहत ऑटो, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों को स्थानीय भाषा में संवाद करने में सक्षम होना जरूरी बताया गया है। नियमों के अनुपालन के लिए भाषा परीक्षण भी कराया जा रहा है और असफल रहने वाले चालकों को नोटिस दिए जाने की कार्रवाई सामने आई है।
अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि भाषा किसी व्यक्ति को जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, न कि लोगों को बांटने का हथियार। उन्होंने सवाल उठाया कि देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आने वाले लोगों के साथ भाषा के आधार पर भेदभाव करना कहां तक उचित है। अखिलेश के बयान को उत्तर भारत की राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है, क्योंकि मुंबई और महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार समेत देश के दूसरे राज्यों से आए लोग रहते और काम करते हैं। खासकर परिवहन क्षेत्र में गैर-मराठी भाषी चालकों की बड़ी संख्या होने के कारण इस फैसले का सीधा असर उन पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
महाराष्ट्र सरकार का तर्क है कि मुंबई और महाराष्ट्र में सार्वजनिक परिवहन सेवाएं देने वाले चालकों को स्थानीय यात्रियों से संवाद करने के लिए राज्य की आधिकारिक भाषा का बुनियादी ज्ञान होना चाहिए। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यात्रियों और चालकों के बीच बेहतर संवाद सुनिश्चित करना है। महाराष्ट्र के परिवहन विभाग ने भाषा दक्षता की जांच की प्रक्रिया शुरू की है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक चालकों को मराठी सीखने का अवसर दिया जा रहा है और नियमों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ चरणबद्ध कार्रवाई की व्यवस्था है।
मामला तब और गरमा गया जब बड़ी संख्या में चालकों के मराठी भाषा परीक्षण में अपेक्षित स्तर हासिल नहीं करने की खबरें सामने आईं। रिपोर्टों के अनुसार कुछ चालकों को नोटिस जारी किए गए हैं और नियमों का पालन नहीं करने पर आगे लाइसेंस या बैज से जुड़ी कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है। इस कार्रवाई से ऑटो और टैक्सी यूनियनों में भी नाराजगी की खबरें सामने आई हैं। यूनियनों का तर्क है कि अचानक भाषा की अनिवार्यता लागू करने से उन चालकों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है जो वर्षों से मुंबई में काम कर रहे हैं लेकिन मराठी में धाराप्रवाह बातचीत नहीं कर पाते।
मुंबई की राजनीति में भाषा का सवाल नया नहीं है। मराठी अस्मिता और स्थानीय लोगों के अधिकार का मुद्दा लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति का अहम हिस्सा रहा है। हालांकि इस बार विवाद का केंद्र सीधे तौर पर ऑटो और टैक्सी चालकों की रोजी-रोटी से जुड़ा है।
सरकार की तरफ से इसे स्थानीय भाषा के सम्मान और सार्वजनिक सेवा में बेहतर संवाद से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि विरोधी दल इसे भाषा के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश बता रहे हैं।
अखिलेश यादव के बयान के बाद यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। मुंबई में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय रहते हैं और महाराष्ट्र में काम करने वाले उत्तर प्रदेश के लोगों के बीच भाषा से जुड़ा यह फैसला स्वाभाविक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन सकता है। समाजवादी पार्टी लगातार भाजपा पर सामाजिक और क्षेत्रीय विभाजन की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। ऐसे में अखिलेश यादव का यह हमला 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
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