सीएम योगी का ईरान-इजरायल युद्ध पर बड़ा बयान

सीएम योगी ने सनातन दर्शन का हवाला देते हुए कहा कि आज देश में कहीं कोई भय या अविश्वास नहीं है, बल्कि हर तरफ ‘सत्यमेव जयते’ का भाव है। उन्होंने कहा, “हर तरफ एक ही आवाज गूंज रही है, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’। जहां धर्म होगा, वहीं जय होगी और वहीं विजय होगी।

Israel Iran War cm yogi
सुरक्षा व्यवस्था पर सीएम योगी का गर्व भरा बयान (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar04 Mar 2026 04:55 PM
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CM Yogi Adityanath's Holi Milan celebration in Gorakhpur : मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा और प्रभावशाली बयान दिया है। सीएम योगी ने वैश्विक अशांति के बीच भारत की स्थिरता और सुरक्षा व्यवस्था पर जोर देते हुए कहा कि जब पूरी दुनिया अव्यवस्था और अराजकता का सामना कर रही है, तभी भारत अपने ‘यशस्वी नेतृत्व’ के साथ उत्साह और उमंग से पर्व मना रहा है।

वैश्विक तनाव के बीच होली का संदेश

सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में होली मिलन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने मिडिल ईस्ट के बढ़ते तनाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “भारत में होली का यह पर्व हम ऐसे समय में आयोजित कर रहे हैं जब पूरी दुनिया में अव्यवस्था, अशांति, अराजकता का वातावरण है। लेकिन, भारत अपने यशस्वी नेतृत्व में आनंद, उत्साह और उमंग के साथ पर्व का आनंद ले रहा है।”

‘सत्यमेव जयते’ और धर्म की विजय

अपने संबोधन में सीएम योगी ने सनातन दर्शन का हवाला देते हुए कहा कि आज देश में कहीं कोई भय या अविश्वास नहीं है, बल्कि हर तरफ ‘सत्यमेव जयते’ का भाव है। उन्होंने कहा, “हर तरफ एक ही आवाज गूंज रही है, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’। जहां धर्म होगा, वहीं जय होगी और वहीं विजय होगी। जहां सत्य होगा वहीं विजय होगी। ये भाव हमारा सनातन वाक्य है, इसकी गूंज हमें सर्वत्र सुनाई दे रही है।”

होलिका दहन का गहरा अर्थ

सीएम योगी ने होलिका दहन की परंपरा को भी नया अर्थ दिया। उन्होंने कहा कि होलिका दहन का मतलब सिर्फ अग्नि को प्रज्वलित करना नहीं, बल्कि अपने अंदर के अहंकार को मिटाना है। उन्होंने कहा, “होलिका दहन का मतलब अपने अंदर का अहंकार मिटाना है। तुष्टिकरण को समाप्त करना है। कहीं कोई भ्रष्टाचार पनप रहा है तो उसकी होलिका दहन कर खत्म करना है।”

अपराधियों और आतंकवादियों को सख्त चेतावनी

इस मौके पर सीएम योगी ने अपराधियों और उग्रवादियों को सख्त संदेश देते हुए कहा कि अगर कोई अराजकता, आतंकवाद या उग्रवाद सिर उठाने का प्रयास करता है, तो उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “यह संकल्प हम सब को सर्वत्र सुनाई दे रहा था।” भगवान नरसिंह के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ईश्वर सर्वत्र है, लेकिन ईश्वर का भक्त बनना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “भक्त बनकर जब ईश्वर की शरण में जाते हैं तो अपने आप ही प्रार्थना स्वीकार होकर फल प्राप्त होता है।” CM Yogi Adityanath's Holi Milan celebration in Gorakhpur

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव समाज की भूमिका

यादव समाज ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसी धारा तैयार की, जिसने पारंपरिक सवर्ण वर्चस्व को चुनौती दी और सामाजिक न्याय की राजनीति को मुख्यधारा में स्थापित किया।

_यादव समाज का प्रभाव (2)
_यादव समाज का प्रभाव (2)
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar03 Mar 2026 07:34 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना, दरअसल भारत की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरणों और लोकतांत्रिक विकास की जटिल यात्रा को समझने जैसा है। इस विशाल राज्य में अनेक जातीय और सामाजिक समूहों ने समय-समय पर अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है, लेकिन यादव समाज की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। यह भूमिका केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक जागरण, पिछड़ा वर्ग राजनीति, नेतृत्व निर्माण और सत्ता-संतुलन की धुरी तक फैली हुई है। यादव समाज ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसी धारा तैयार की, जिसने पारंपरिक सवर्ण वर्चस्व को चुनौती दी और सामाजिक न्याय की राजनीति को मुख्यधारा में स्थापित किया।

यादव समाज की सामाजिक पृष्ठभूमि

यादव समाज परंपरागत रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़ा रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, लेकिन लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीमित रहा। स्वतंत्रता के बाद जब लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होने लगीं, तब सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में राजनीतिक भागीदारी की आकांक्षा भी बढ़ी। 1960 और 1970 के दशक में समाजवादी विचारधारा के प्रसार ने यादव समाज को वैचारिक आधार प्रदान किया। डॉ. लोहिया की ‘समानता’ की अवधारणा और पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के विचार ने यादव युवाओं और बुद्धिजीवियों को प्रेरित किया। यहीं से एक संगठित राजनीतिक चेतना का विकास शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल दी।

मंडल राजनीति और सामाजिक न्याय का दौर

1990 का दशक उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ मिला और राजनीतिक विमर्श में ‘सामाजिक न्याय’ प्रमुख मुद्दा बन गया। यादव समाज, जो पिछड़े वर्गों में संगठित और संख्या के लिहाज से प्रभावशाली था, इस नई राजनीति का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरा। मंडल के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। चुनाव अब केवल विकास या राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और सम्मान के सवाल पर भी लड़े जाने लगे। यादव समाज ने इस अवसर को राजनीतिक शक्ति में बदलने का कार्य किया।

मुलायम सिंह यादव का दौर 

उत्तर प्रदेश में यादव राजनीति की सबसे प्रमुख पहचान मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सामने आई। एक शिक्षक से राजनीति में आए मुलायम सिंह ने समाजवादी विचारधारा को आधार बनाकर पिछड़े वर्गों, खासकर यादवों को संगठित किया। उनके नेतृत्व में बनी राजनीतिक धारा ने न केवल यादव समाज को सत्ता में मजबूत प्रतिनिधित्व दिलाया, बल्कि मुसलमानों और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ एक व्यापक सामाजिक गठबंधन भी तैयार किया। यह गठबंधन लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता रहा। मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में यादव समाज को प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रतिनिधित्व मिला। इससे समाज के भीतर आत्मविश्वास और राजनीतिक सक्रियता बढ़ी। हालांकि विरोधियों ने इसे ‘एक जाति विशेष की राजनीति’ कहकर आलोचना भी की, लेकिन समर्थकों का तर्क रहा कि यह ऐतिहासिक वंचना की भरपाई थी। समाजवादी पार्टी के गठन के बाद यादव समाज पार्टी का मुख्य आधार बन गया। चुनावी विश्लेषणों में ‘यादव वोट बैंक’ शब्द प्रचलित हुआ, जो दर्शाता है कि यह समाज एकजुट होकर मतदान करने की क्षमता रखता है। लेकिन केवल जातीय आधार पर राजनीति टिकाऊ नहीं हो सकती। समाजवादी पार्टी ने समय-समय पर अन्य पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को साथ जोड़ने की कोशिश की। फिर भी, पार्टी की पहचान में यादव नेतृत्व और यादव मतदाता केंद्रीय तत्व बने रहे। यादव समाज की संगठित राजनीतिक चेतना ने उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीतियों को गहराई से प्रभावित किया। अन्य दलों ने भी इस समाज को अपने पक्ष में करने के लिए विशेष रणनीतियां बनाईं।

नई पीढ़ी का नेतृत्व और बदलता राजनीतिक परिदृश्य

समय के साथ यादव राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव भी आया। अखिलेश यादव के नेतृत्व में एक नई शैली की राजनीति देखने को मिली। जहां मुलायम सिंह का दौर संघर्ष और संगठन निर्माण का था, वहीं अखिलेश यादव ने विकास, तकनीक और शहरी मुद्दों को भी प्राथमिकता दी। इस बदलाव ने यह संकेत दिया कि यादव समाज केवल पारंपरिक जातीय राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह व्यापक विकास और आधुनिकता के एजेंडे के साथ भी जुड़ना चाहता है। हालांकि, चुनावी पराजयों और आंतरिक चुनौतियों ने यह भी दिखाया कि केवल एक सामाजिक आधार पर्याप्त नहीं है; व्यापक सामाजिक गठबंधन आवश्यक है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई भी दल यादव समाज को नजरअंदाज नहीं कर सकता। भारतीय जनता पार्टी ने भी समय-समय पर यादव नेताओं को आगे बढ़ाकर इस समाज में पैठ बनाने की कोशिश की। इसके अतिरिक्त, बहुजन समाज पार्टी ने भी सामाजिक इंजीनियरिंग के माध्यम से पिछड़े वर्गों में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई। हालांकि यादव समाज का मुख्य झुकाव समाजवादी धारा की ओर बना रहा, लेकिन समय-समय पर मतों का बिखराव भी देखने को मिला। UP News

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जाट समाज के बिना अधूरी है उत्तर प्रदेश की राजनीति

ऐसे में जब हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की बात करते हैं, तो जाट समाज का नाम स्वाभाविक रूप से केंद्र में आ जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जाट समाज के बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति की तस्वीर अधूरी नजर आती है।

जाट समाज की राजनीतिक पकड़ 1
जाट समाज की राजनीतिक पकड़ 1
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar03 Mar 2026 07:28 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति को यदि गहराई से समझना हो, तो जातीय समीकरणों की परतों को खोलना अनिवार्य हो जाता है। यह राज्य केवल जनसंख्या के आधार पर देश का सबसे बड़ा प्रदेश नहीं है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी भारत की धुरी माना जाता है। ऐसे में जब हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की बात करते हैं, तो जाट समाज का नाम स्वाभाविक रूप से केंद्र में आ जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जाट समाज के बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति की तस्वीर अधूरी नजर आती है।

किसान आंदोलनों से उपजी राजनीतिक चेतना

जाट समाज की राजनीतिक चेतना की जड़ें किसान आंदोलनों से जुड़ी रही हैं। स्वतंत्रता के बाद जब देश में भूमि सुधार और कृषि नीतियों पर बहस तेज हुई, तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसानों ने संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद की। इसी पृष्ठभूमि से उभरे जाटों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह, जिन्होंने किसानों को राजनीतिक शक्ति में बदलने का कार्य किया। चौधरी चरण सिंह ने ग्रामीण भारत, विशेषकर जाट किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उनकी राजनीति जाति आधारित होते हुए भी केवल जाति तक सीमित नहीं थी; वह कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान स्वाभिमान की राजनीति थी। यही कारण है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समाज लंबे समय तक उन्हें अपना राजनीतिक मार्गदर्शक मानता रहा।

जाट राजनीति का गढ़ है पश्चिमी उत्तर प्रदेश 

मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर जैसे जिलों में जाट समाज की जनसंख्या निर्णायक मानी जाती है। इन क्षेत्रों में चुनावी परिणाम अक्सर जाट वोटों की दिशा पर निर्भर करते रहे हैं। समय के साथ जाट राजनीति ने अलग-अलग दलों के साथ गठजोड़ किया। कभी क्षेत्रीय दलों के साथ तो कभी राष्ट्रीय दलों के साथ, जाट नेतृत्व ने परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदली। अजीत सिंह और बाद में जयंत चौधरी ने जाट राजनीति को नई पीढ़ी के साथ जोड़ने का प्रयास किया। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि जाट समाज केवल परंपरागत राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश के अनुसार स्वयं को ढालता भी रहा है।

मंडल, कमंडल और जाट समीकरण

1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों और धार्मिक राजनीति के उभार ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दी। इस दौर में जाट समाज के सामने पहचान और प्रतिनिधित्व की दोहरी चुनौती थी। जहां एक ओर पिछड़े वर्ग की राजनीति मजबूत हो रही थी, वहीं दूसरी ओर धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रभाव भी दिखाई देने लगा। जाट समाज ने इन दोनों धाराओं के बीच संतुलन साधते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति तय की। यही कारण है कि समय-समय पर जाट मतदाताओं का झुकाव अलग-अलग दलों की ओर होता रहा।

किसान आंदोलन और नई राजनीतिक चेतना

हाल के वर्षों में किसान आंदोलन ने जाट समाज की राजनीतिक भूमिका को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जाट समाज आज भी कृषि और किसान हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। इस आंदोलन ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस दौर ने जाट-मुस्लिम एकता की पुरानी सामाजिक संरचना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, जिसका सीधा प्रभाव चुनावी राजनीति पर भी पड़ा।

बदलती पीढ़ी और नई चुनौतियां

आज का जाट युवा केवल खेत और खलिहान तक सीमित नहीं है। शिक्षा, रोजगार, सेना, खेल और प्रशासनिक सेवाओं में जाट युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। इस सामाजिक परिवर्तन ने उनकी राजनीतिक अपेक्षाओं को भी बदला है। अब केवल जातीय पहचान के आधार पर वोट देना पर्याप्त नहीं माना जाता। विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और क्षेत्रीय सम्मान जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह बदलाव जाट राजनीति को अधिक परिपक्व और बहुआयामी बना रहा है। UP News

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