उत्तर प्रदेश की इस भ्रष्ट महिला अधिकारी को हाईकोर्ट से झटका, नहीं मिली राहत
उत्तर प्रदेश से जुड़े चर्चित भ्रष्टाचार मामले में CGST विभाग की आईआरएस अधिकारी प्रभा भंडारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से बड़ा झटका लगा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनकी जमानत याचिका खारिज को कर दिया है।

UP News : उत्तर प्रदेश से जुड़े चर्चित भ्रष्टाचार मामले में CGST विभाग की आईआरएस अधिकारी प्रभा भंडारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से बड़ा झटका लगा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनकी जमानत याचिका खारिज को कर दिया है। अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए साफ संकेत दिया कि केस में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इतने गंभीर हैं कि इस स्तर पर किसी तरह की राहत देना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया आरोपी अधिकारी की भूमिका को गंभीर बनाती है। न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई लोकसेवक अपने पद का कथित दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा हो, तब केवल सहानुभूति या निजी परिस्थितियों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।
व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्डिंग बनी सबसे अहम कड़ी
इस मामले में जमानत खारिज होने का सबसे बड़ा कारण वह डिजिटल साक्ष्य बना, जिसे जांच एजेंसी सीबीआई ने अदालत के सामने रखा। अदालत ने अपने आदेश में विशेष रूप से उस व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्डिंग का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर प्रभा भंडारी अपने अधीनस्थ अधिकारी को रिश्वत की रकम “सोने में बदलने” का निर्देश देती सुनाई देती हैं। अदालत ने माना कि इस रिकॉर्डिंग से पूरे प्रकरण में उनकी संभावित संलिप्तता का स्पष्ट संकेत मिलता है। यही वजह रही कि कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के रहते जमानत देने का कोई मजबूत आधार नहीं बनता। उत्तर प्रदेश से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले में डिजिटल सबूतों ने जांच की दिशा ही बदल दी।
उत्तर प्रदेश के झांसी से जुड़ा है पूरा मामला
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, यह मामला उत्तर प्रदेश के झांसी में प्रभा भंडारी की तैनाती के दौरान सामने आया। आरोप है कि जीएसटी चोरी के एक बड़े मामले को दबाने और संबंधित व्यापारियों को राहत देने के बदले करीब डेढ़ करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। सीबीआई की जांच में दावा किया गया कि इस कथित सौदेबाजी में विभागीय स्तर पर मिलीभगत थी। जांच एजेंसी ने जाल बिछाकर सह-आरोपी अधीक्षक अजय शर्मा के पास से 70 लाख रुपये नकद बरामद किए थे। एजेंसी का कहना है कि शुरुआती जांच और जुटाए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इस ओर इशारा करते हैं कि पूरी साजिश का संचालन वरिष्ठ स्तर से किया जा रहा था।
बचाव के तर्कों पर भारी पड़े भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
प्रभा भंडारी की ओर से अदालत में कई आधारों पर जमानत की मांग की गई। बचाव पक्ष ने कहा कि उनके पास से सीधे कोई नकदी बरामद नहीं हुई है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि वह गर्भवती हैं, उनका एक छोटा बच्चा है और मामले में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, इसलिए उन्हें जेल में बनाए रखने की जरूरत नहीं है। हालांकि, सीबीआई की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। एजेंसी ने अदालत को बताया कि मामला केवल सह-आरोपी के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की एक मजबूत श्रृंखला मौजूद है, जो आरोपों को गंभीर बनाती है। कोर्ट ने भी माना कि जब आरोप पद के दुरुपयोग, रिश्वतखोरी और कथित तौर पर अवैध धन को सोने में बदलने जैसे निर्देशों से जुड़े हों, तब मामला सामान्य नहीं माना जा सकता। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश से जुड़े चर्चित भ्रष्टाचार मामले में CGST विभाग की आईआरएस अधिकारी प्रभा भंडारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से बड़ा झटका लगा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनकी जमानत याचिका खारिज को कर दिया है। अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए साफ संकेत दिया कि केस में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इतने गंभीर हैं कि इस स्तर पर किसी तरह की राहत देना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया आरोपी अधिकारी की भूमिका को गंभीर बनाती है। न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई लोकसेवक अपने पद का कथित दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा हो, तब केवल सहानुभूति या निजी परिस्थितियों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।
व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्डिंग बनी सबसे अहम कड़ी
इस मामले में जमानत खारिज होने का सबसे बड़ा कारण वह डिजिटल साक्ष्य बना, जिसे जांच एजेंसी सीबीआई ने अदालत के सामने रखा। अदालत ने अपने आदेश में विशेष रूप से उस व्हाट्सएप कॉल रिकॉर्डिंग का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर प्रभा भंडारी अपने अधीनस्थ अधिकारी को रिश्वत की रकम “सोने में बदलने” का निर्देश देती सुनाई देती हैं। अदालत ने माना कि इस रिकॉर्डिंग से पूरे प्रकरण में उनकी संभावित संलिप्तता का स्पष्ट संकेत मिलता है। यही वजह रही कि कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के रहते जमानत देने का कोई मजबूत आधार नहीं बनता। उत्तर प्रदेश से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले में डिजिटल सबूतों ने जांच की दिशा ही बदल दी।
उत्तर प्रदेश के झांसी से जुड़ा है पूरा मामला
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, यह मामला उत्तर प्रदेश के झांसी में प्रभा भंडारी की तैनाती के दौरान सामने आया। आरोप है कि जीएसटी चोरी के एक बड़े मामले को दबाने और संबंधित व्यापारियों को राहत देने के बदले करीब डेढ़ करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। सीबीआई की जांच में दावा किया गया कि इस कथित सौदेबाजी में विभागीय स्तर पर मिलीभगत थी। जांच एजेंसी ने जाल बिछाकर सह-आरोपी अधीक्षक अजय शर्मा के पास से 70 लाख रुपये नकद बरामद किए थे। एजेंसी का कहना है कि शुरुआती जांच और जुटाए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इस ओर इशारा करते हैं कि पूरी साजिश का संचालन वरिष्ठ स्तर से किया जा रहा था।
बचाव के तर्कों पर भारी पड़े भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
प्रभा भंडारी की ओर से अदालत में कई आधारों पर जमानत की मांग की गई। बचाव पक्ष ने कहा कि उनके पास से सीधे कोई नकदी बरामद नहीं हुई है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि वह गर्भवती हैं, उनका एक छोटा बच्चा है और मामले में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, इसलिए उन्हें जेल में बनाए रखने की जरूरत नहीं है। हालांकि, सीबीआई की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। एजेंसी ने अदालत को बताया कि मामला केवल सह-आरोपी के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की एक मजबूत श्रृंखला मौजूद है, जो आरोपों को गंभीर बनाती है। कोर्ट ने भी माना कि जब आरोप पद के दुरुपयोग, रिश्वतखोरी और कथित तौर पर अवैध धन को सोने में बदलने जैसे निर्देशों से जुड़े हों, तब मामला सामान्य नहीं माना जा सकता। UP News












