इसकी एक- एक टहनी और डाल में भारतीय शूरवीरों के बलिदान की कहानी सिमटी है। इसलिए, आजादी मिलने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू क्रांति और बलिदान के प्रतीक इस 'फांसी इमली' वृक्ष को देखने गए थे। अंग्रेजों ने इमली के कई वृक्षों को कटवा दिया।

UP News : उत्तर प्रदेश में हजारों प्रकार की विशेषताएं हैं। उत्तर प्रदेश की इन्हीं विशेषताओं में एक ऐसी भी विशेषता मौजूद है जो उत्तर प्रदेश के अलावा कहीं दूसरी जगह मौजूद नहीं है। उत्तर प्रदेश की इस अनोखी विशेषता का नाम है ‘‘फांसी इमली” का पेड़। हो सकता है कि पाठकों ने ‘‘फांसी इमली” के पेड़ का नाम पहले कभी सुना हो। यह परम सत्य है कि उत्तर प्रदेश में मौजूद ‘‘फांसी इमली” का पेड़ अपने आप में बहुत ही अनोखा पेड़ है।
‘‘फांसी इमली” का अनोख पेड़ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में मौजूद है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गढ़वा मोड़ के पास महिला इंटर कॉलिज के निकट इमली का एक ऐतिहासिक पेड़ है। इस पेड़ को ही ‘‘फांसी इमली” का पेड़ कहा जाता है। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थित इस पेड़ का इतिहास भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ है। आचार्य पृथ्वीनाथ पाण्डेय के संपादकीय नेतृत्व में तैयार 'स्वातंत्र्य समर में इलाहाबाद का शंखनाद' नामक संकलन में बलिदान के गवाह इस पेड़ का परिचय 'फांसी इमली के नाम से कराया गया है। प्रयाग के पुराने लोग इसी नाम से इस वृक्ष को जानते हैं। बीते कुंभ की तैयारी के समय शहर के सौंदर्याकरण के दौरान इसे संरक्षित करने का प्रयास भी किया गया है। दरअसल, यह पेड़ उन अनगिनत इमली के वृक्षों में से एक है, जो देश को आजादी मिलने से पहले तक जीटी मुख्य मार्ग पर खड़े थे।। अंग्रेजी शासन के खिलाफ पहली लड़ाई के बाद से ही इन पेड़ों ने अंग्रेजों की क्रूरता देखी है। निर्मम अंग्रेज भारत माता के सपूतों की गर्दन रस्सी से बांधकर इन्हीं पेड़ों की टहनियों पर लटकाकर फांसी देते थे। उनका उद्देश्य होता था कि सडक़ पर चलने वाले लोग इन सेनानियों के लटकते शरीर को देखें और दहशत में आ जाएं। जब यह क्रूरता भी वीर सपूतों का हौसला नहीं तोड़ सकी, तब कालांतर में। इसकी एक- एक टहनी और डाल में भारतीय शूरवीरों के बलिदान की कहानी सिमटी है। इसलिए, आजादी मिलने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू क्रांति और बलिदान के प्रतीक इस 'फांसी इमली' वृक्ष को देखने गए थे। अंग्रेजों ने इमली के कई वृक्षों को कटवा दिया।
‘फांसी इमली” के पेड़ के नाम से प्रसिद्ध इस पेड़ के आसपास के अनेक पेड़ अपनी उम्र पूरी कर खत्म हो गए। यह पेड़ नौजवान बलिदानियों के त्याग व कर्नल नीन की निर्ममता बयां करने के लिए आज भी खड़ा है। वर्तमान शासन और प्रशासन ने भी इसे सहेजने का प्रयास किया है। अब जरूरत है कि हमारे पूर्वजों के साहस, त्याग और बलिदान के प्रतीकों से नई पीढ़ी को रूबरू कराने का। आवश्यकता है कि ऐसी धरोहरों को पाठ्यपुस्तक का हिस्सा बनाया जाए और नई पीढ़ी को हजारों सपूतों के बलिदान की कहानी बताई जाए। तभी देश की आजादी के लिए किया गया वीर सपूतों का संघर्ष सही मायने में अमर रह सकेगा।
उत्तर प्रदेश के जो लोग प्रयागराज में रहते हैं उन्होंने कभी ना कभी ‘‘फांसी इमली” का पेड़ देखा है। आवश्यकता इस बात की है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भर के लोगों को ‘‘फांसी इमली” के पेड़ को जरूर देखना चाहिए। स्वतंत्रता आंदोलन के इसी प्रकार के अनेक प्रतीक हमें भारत की स्वतंत्रता के महत्व से परिचित कराते हें। UP News