उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया किडनी ट्रांसप्लांट कांड अब देश के सबसे बड़े मेडिकल घोटालों में गिना जा रहा है। पुलिस जांच में लगातार ऐसे खुलासे हो रहे हैं जो न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर रहे हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया किडनी ट्रांसप्लांट कांड अब देश के सबसे बड़े मेडिकल घोटालों में गिना जा रहा है। पुलिस जांच में लगातार ऐसे खुलासे हो रहे हैं जो न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर रहे हैं। इस कांड में यह बात सामने आई है कि आठवीं पास एंबुलेंस चालक और ओटी टेक्नीशियन खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों का इलाज कर रहे थे और अवैध किडनी ट्रांसप्लांट कर रहे थे। जांच एजेंसियों के अनुसार यह पूरा नेटवर्क कई शहरों और अस्पतालों तक फैला हुआ था और इसमें डॉक्टरों, दलालों, टेक्नीशियनों तथा अस्पताल संचालकों की मिलीभगत सामने आ रही है।
कानपुर किडनी कांड का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस पूरे रैकेट का सूत्रधार एक एंबुलेंस चालक बताया जा रहा है, जो केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ा हुआ है। जांच में सामने आया कि वह खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों और डोनरों से बातचीत करता था और उन्हें भरोसा दिलाता था कि ऑपरेशन सुरक्षित है। कई मामलों में यही व्यक्ति विदेशी मरीजों से अंग्रेज़ी में बातचीत कर उन्हें इलाज का भरोसा दिलाता था। बाद में ऑपरेशन के दौरान असली डॉक्टर की जगह ओटी टेक्नीशियन और अन्य सहयोगी सर्जरी कर देते थे।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि ऑपरेशन थिएटर में कई बार योग्य सर्जन मौजूद ही नहीं होते थे। एक ओटी टेक्नीशियन ने खुद को यूरोलॉजिस्ट बताकर 40 से 50 तक किडनी ट्रांसप्लांट करने की बात सामने आई है। इस पूरे खेल में कई टेक्नीशियन और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल थे, जिन्हें हर ऑपरेशन पर कमीशन दिया जाता था। कुछ टेक्नीशियन तो दूसरे शहरों से फ्लाइट से बुलाए जाते थे और ऑपरेशन के बाद तुरंत वापस भेज दिए जाते थे।
जांच में सामने आया कि इस रैकेट का कारोबार करोड़ों रुपये का था। गरीब और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर उनकी किडनी लगभग 10 लाख रुपये में खरीदी जाती थी, जबकि जरूरतमंद मरीजों से 60 से 90 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। कई मामलों में डोनरों को तय रकम भी नहीं दी जाती थी। एक डोनर ने शिकायत की कि उसे तय रकम से 50 हजार रुपये कम दिए गए, इसी विवाद के बाद पूरा रैकेट पुलिस के सामने आ गया।
इस कांड में शामिल कुछ लोगों के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें वे नोटों की गड्डियों के साथ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस का कहना है कि अंगों की तस्करी से जुड़े इस नेटवर्क में दलालों की बड़ी भूमिका थी, जो डोनर और मरीज दोनों को ढूंढते थे। जांच में यह भी पता चला है कि यह गिरोह टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से संपर्क करता था और अलग-अलग अस्पतालों का इस्तेमाल करके पूरी प्रक्रिया को छिपाने की कोशिश करता था।
कानपुर के इस किडनी रैकेट के तार विदेशों तक जुड़े होने की आशंका भी जताई जा रही है। जांच में यह सामने आया है कि इस गिरोह ने विदेशी महिलाओं और अन्य मरीजों का भी किडनी ट्रांसप्लांट कराया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ अंग तस्करी का नेटवर्क हो सकता है।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने कानपुर के कई निजी अस्पतालों पर छापेमारी की है। जांच में कम से कम आठ अस्पतालों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। अब तक कई डॉक्टरों, टेक्नीशियनों और दलालों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कई आरोपी फरार बताए जा रहे हैं। पुलिस अलग-अलग शहरों में छापेमारी कर पूरे नेटवर्क को पकड़ने की कोशिश कर रही है।
कानपुर का यह किडनी कांड स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। बिना अनुमति और बिना योग्य डॉक्टरों के इतने बड़े पैमाने पर अवैध ट्रांसप्लांट होना यह दिखाता है कि निजी अस्पतालों में नियमों का पालन किस तरह नजरअंदाज किया गया। सरकार और स्वास्थ्य विभाग अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं और कई अस्पतालों के लाइसेंस भी रद्द किए जा सकते हैं। UP News