विज्ञापन
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश में सामने आए चर्चित किडनी कांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। इस पूरे मामले में रोहित तिवारी नाम का शख्स जांच एजेंसियों के रडार पर सबसे अहम किरदार बनकर उभरा है।

UP News : उत्तर प्रदेश में सामने आए चर्चित किडनी कांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। इस पूरे मामले में रोहित तिवारी नाम का शख्स जांच एजेंसियों के रडार पर सबसे अहम किरदार बनकर उभरा है। पुलिस का दावा है कि उत्तर प्रदेश में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट के इस नेटवर्क को चलाने, अस्पताल चुनने, पैकेज तय करने और ऑपरेशन की पूरी व्यवस्था संभालने में रोहित की केंद्रीय भूमिका थी। जांच में सामने आया है कि रोहित तिवारी केवल एक संपर्क सूत्र नहीं था, बल्कि वह इस पूरे अवैध खेल का ऐसा संचालक बन चुका था, जो तय करता था कि किस मरीज का ट्रांसप्लांट कहां होगा, कितने पैसों में होगा और पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल रहेगा। UP News
पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि रोहित तिवारी वर्ष 2018 से इस अवैध धंधे में सक्रिय था। शुरुआती दौर में वह अस्पतालों और डॉक्टरों के संपर्क में आया, लेकिन धीरे-धीरे उसने खुद को उस भूमिका में स्थापित कर लिया, जहां से पूरा नेटवर्क संचालित होने लगा। जांच के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कई ऐसे ट्रांसप्लांट कराए गए, जिनमें अस्पतालों का चयन, टीम की तैयारी, मरीज और डोनर की व्यवस्था, यहां तक कि आर्थिक सौदेबाजी तक रोहित की निगरानी में होती थी।
बताया जा रहा है कि वह हर केस के बदले भारी रकम लेता था। मरीज की प्रोफाइल, उसकी आर्थिक क्षमता और ऑपरेशन की परिस्थिति के हिसाब से पैकेज तय किया जाता था। विदेशी नागरिकों के मामलों में रकम और अधिक होने की बात भी सामने आई है। इस तरह उत्तर प्रदेश में यह पूरा खेल केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक संगठित अवैध कारोबार की शक्ल ले चुका था। UP News
जांच एजेंसियों के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस पूरे रैकेट का सबसे प्रमुख संचालन कानपुर के जरिए हुआ। पूछताछ में यह बात सामने आई है कि रोहित ने 30 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट कराए जाने की बात स्वीकार की है। इनमें कुछ मामलों में अलग-अलग अस्पतालों के नाम भी सामने आए हैं। पुलिस अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश के किन-किन शहरों में यह नेटवर्क फैला हुआ था और किन स्तरों पर इसे संरक्षण मिला। रोहित तिवारी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का रहने वाला बताया गया है। शुरुआती जीवन में वह सामान्य नौकरियों से जुड़ा रहा, लेकिन बाद में अस्पतालों और निजी क्लीनिकों के संपर्क में आने के बाद उसकी भूमिका बदलती चली गई। जांच में यह बात भी सामने आई है कि वह उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में सक्रिय लोगों के संपर्क में था और धीरे-धीरे उसने इस पूरे नेटवर्क में अपने लिए एक मजबूत जगह बना ली। पुलिस का मानना है कि रोहित ने सीधे मरीजों के संपर्क में आने के बजाय एजेंटों की मदद से काम करने की रणनीति अपनाई। यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक यह नेटवर्क सक्रिय रहने के बावजूद वह सीधे संदेह के घेरे में आने से बचता रहा। UP News
जांच में सामने आया है कि रोहित खुद सीधे हर व्यक्ति से जुड़कर काम नहीं करता था। मरीज एजेंटों के जरिए आते थे, डोनर की तलाश अलग चैनलों से होती थी और ऑपरेशन की तैयारी पहले से तय टीम के जरिए की जाती थी। उत्तर प्रदेश में इस अवैध ट्रांसप्लांट नेटवर्क की सबसे खतरनाक बात यही थी कि इसमें हर भूमिका के लिए अलग व्यक्ति मौजूद था, लेकिन पूरी रणनीति एक ही केंद्र से संचालित हो रही थी। पुलिस के मुताबिक किस अस्पताल में ऑपरेशन होगा, किस डॉक्टर या तकनीकी व्यक्ति की क्या भूमिका रहेगी, कौन सा संसाधन कहां से आएगा और पूरा काम किस समय किया जाएगा, यह सब रोहित के स्तर पर तय होता था। इससे साफ है कि उत्तर प्रदेश में यह मामला किसी एक अस्पताल या एक डॉक्टर तक सीमित नहीं था, बल्कि एक संगठित तंत्र की तरह काम कर रहा था। UP News
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल यह है कि इतनी जटिल सर्जरी आखिर किसके द्वारा की जा रही थी। किडनी ट्रांसप्लांट कोई सामान्य ऑपरेशन नहीं है, लेकिन जांच में यह संकेत मिले हैं कि इस पूरे खेल में ऐसे लोग भी सक्रिय थे, जिनकी भूमिका और योग्यता पर गंभीर संदेह है। उत्तर प्रदेश में सामने आए इस मामले ने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। पुलिस के अनुसार कुछ नाम ऐसे हैं, जो ऑपरेशन थिएटर और एनेस्थीसिया से जुड़े कामों में शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अब भी कई अहम चेहरे फरार हैं और माना जा रहा है कि उनकी गिरफ्तारी के बाद ही उत्तर प्रदेश के इस किडनी कांड का पूरा सच सामने आ सकेगा। UP News
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि रोहित तिवारी बेहद सतर्क और चालाक तरीके से काम करता था। उसके पास कई सिम कार्ड होने, मोबाइल रिकॉर्ड को सामान्य तरीके से इस्तेमाल न करने और फरारी के दौरान लगातार नंबर बदलने जैसी बातें सामने आई हैं। पुलिस का कहना है कि उत्तर प्रदेश में वह लंबे समय तक इसलिए बचा रहा, क्योंकि उसने अपने कामकाज को परत-दर-परत छिपाकर रखा। जांच में यह पहलू भी उभरकर आया है कि फरारी के दौरान उसके निजी संपर्कों और निजी रिश्तों के जरिए उसकी लोकेशन ट्रेस की जा सकी। इस तरह उत्तर प्रदेश पुलिस को उस तक पहुंचने में तकनीकी निगरानी के साथ मानवीय कड़ियों ने भी मदद की। UP News
जांच एजेंसियों के मुताबिक इस अवैध ट्रांसप्लांट नेटवर्क में रकम का खेल बेहद बड़ा था। मरीजों से भारी पैकेज तय किए जाते थे और फिर उसी पैसे से ऑपरेशन टीम, लॉजिस्टिक्स और बाकी इंतजाम किए जाते थे। कुछ मामलों में यह भी पता चला है कि ऑपरेशन के बाद मिली रकम को शौक और मौज-मस्ती पर खर्च किया गया। UP News
विज्ञापन