उत्तर प्रदेश में किडनी का काला कारोबार उजागर हुआ है। सारी मानवता को शर्मसार करने वाले किडनी का काला कारोबार चलाकर करोड़ों रूपए कमा रहे हैं। ईंसान की किडनी खरीदने तथा बेचने के इस काले कारोबार में उत्तर प्रदेश के अनेक डाक्टरों की भूमिका प्रकाश में आई है।

UP News : उत्तर प्रदेश में किडनी का काला कारोबार उजागर हुआ है। सारी मानवता को शर्मसार करने वाले किडनी का काला कारोबार चलाकर करोड़ों रूपए कमा रहे हैं। ईंसान की किडनी खरीदने तथा बेचने के इस काले कारोबार में उत्तर प्रदेश के अनेक डाक्टरों की भूमिका प्रकाश में आई है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने किडनी का काला कारोबार चलाने वालों का पर्दाफाश करने का दावा किया है। दूसरी तरफ आशंका यह है कि उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किडनी का काला कारोबार अभी भी चलाया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में किडनी का काला कारोबार उजागर हुआ है। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में चल रहे किडनी के काले कारोबार का खुलासा तब हुआ, जब बिहार के समस्तीपुर निवासी और मेरठ में MBA की पढ़ाई कर रहे छात्र आयुष ने पुलिस से शिकायत की। आर्थिक तंगी से जूझ रहे आयुष ने 10 लाख रुपये में अपनी किडनी बेचने का सौदा किया था। लेकिन ऑपरेशन के बाद दलालों ने उसे पूरे पैसे नहीं दिए और 50 हजार रुपये काट लिए। साढ़े नौ लाख रुपये लेकर नाराज आयुष ने पुलिस को फोन कर दिया। यही कॉल इस बड़े रैकेट के लिए काल साबित हुई। उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच में सामने आया कि इस गिरोह का मुख्य सरगना शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काड़ा था, जो पेशे से एम्बुलेंस चालक था। वह टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को तलाशता और किडनी बेचने का लालच देता था. आयुष को भी इसी तरह जाल में फंसाया गया। जांच में पता चला कि मुजफ्फरनगर की मरीज पारुल तोमर को किडनी की जरूरत थी. दलालों और डॉक्टरों ने उसके परिजनों से 60 लाख रुपये वसूले। वहीं किडनी देने वाले आयुष को सिर्फ 10 लाख देने का सौदा हुआ. यानी एक ऑपरेशन में ही 50 लाख रुपये का सीधा मुनाफा गिरोह की जेब में गया।
उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के रावतपुर इलाके में अस्पताल से लेकर अनेक अस्पतालों पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने छापेमारी की है। पुलिस ने इस मामले में एक अस्पताल के संचालक डॉक्टर दंपति प्रीति आहूजा और सुरजीत सिंह आहूजा को गिरफ्तार किया है। इन्हीं के अस्पताल में अवैध ट्रांसप्लांट होने की आशंका जताई गई है। जांच के दौरान जो शुरुआती तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं. बताया जा रहा है कि ऑपरेशन थिएटर में बिना जरूरी अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते थे और इसके लिए मोटी रकम वसूली जाती थी। एक सर्जरी के लिए रोजाना साढ़े तीन से चार लाख रुपये तक की मांग की जाती थी. यह रकम सिर्फ ऑपरेशन की थी इसके अलावा डोनर और रिसीवर के बीच अलग से सौदे होते थे। जांच में सामने आया है कि यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं था, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के तहत काम हो रहा था. इसमें दलाल, डॉक्टर, अस्पताल प्रबंधन और बाहर के लोगों की एक चेन की तरह जुड़े हुए थे. इस नेटवर्क का एक अहम किरदार शिवम अग्रवाल बताया जा रहा है, जो कथित तौर पर बिचौलिये की भूमिका निभा रहा था. वह जरूरतमंद लोगों को तलाशता, उन्हें पैसों का लालच देता और फिर उन्हें इस सिस्टम में जोड़ देता। इस पूरे मामले में सबसे दर्दनाक पहलू उन लोगों की कहानी है, जो मजबूरी में इस जाल में फंस गए. उत्तराखंड के एक युवक को 10 लाख रुपये का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार किया गया. उसे बताया गया कि उसकी किडनी किसी जरूरतमंद रिश्तेदार के लिए ली जा रही है. आर्थिक तंगी से जूझ रहे उस युवक ने हामी भर दी। लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी. आरोप है कि उसकी किडनी निकालकर उसे 6 लाख रुपये नकद और 3.5 लाख रुपये का चेक दिया गया, जबकि उसी किडनी को एक महिला के परिजनों को 90 लाख रुपये से ज्यादा में बेच दिया गया।
ऑपरेशन के बाद डोनर और रिसीवर दोनों को कुछ समय तक अस्पताल में रखा जाता था, लेकिन फिर उन्हें अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर दिया जाता था। इसका मकसद साफ था किसी भी तरह का सीधा लिंक न बन पाए. अगर जांच हो भी, तो एक ही जगह से पूरा नेटवर्क पकड़ में न आए। सूत्रों के मुताबिक, डोनर को दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी पहचान भी बदल दी गई। वहीं रिसीवर को किसी और जगह शिफ्ट कर दिया गया। इस पूरे रैकेट का खुलासा तब हुआ, जब डोनर को तय रकम से कम पैसे मिले। उसे बार-बार टाला गया, जिससे परेशान होकर उसने पुलिस का दरवाजा खटखटाया। यहीं से कहानी पलटी। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच शुरू की। शुरुआती जांच में ही इतने संकेत मिले कि मामला बड़ा है, जिसके बाद कार्रवाई तेज कर दी गई। क्राइम ब्रांच ने कई अस्पतालों में एक साथ छापेमारी की। इसमें प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर, आहूजा हॉस्पिटल और मेडलाइफ हॉस्पिटल शामिल थे। जांच के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज, मरीजों की जानकारी और अन्य सबूत जुटाए गए। अस्पताल संचालकों, डॉक्टर दंपति और दलाल शिवम को हिरासत में लिया गया। इसके अलावा, उस अस्पताल में भी पुलिस पहुंची जहां किडनी पाने वाली महिला को शिफ्ट किया गया था वहां से भी कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क का जाल छात्रों तक फैला हुआ था. डोनर ‘आयुष’ ने खुद को MBA का छात्र बताया। सूत्रों के अनुसार, एक अन्य मामले में एक छात्रा से करीब 4 लाख रुपये में किडनी डोनेट करवाई गई और बाद में उसे 45 से 50 लाख रुपये में बेचने की आशंका जताई गई। UP News