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उत्तर प्रदेश के रहने वाले नरेन्द्र कुमार की कहानी बहुत बड़ी मिसाल बन गई है। उत्तर प्रदेश का बेटा नरेन्द्र कुमार वर्तमान में दुनिया का प्रसिद्ध वैज्ञानिक है। एक समय था जब कई किलोमीटर दूर स्कूल तक जाने के लिए नरेन्द्र के पैरों में चप्पल तक नहीं होती थी।

UP News : उत्तर प्रदेश के रहने वाले नरेन्द्र कुमार की कहानी बहुत बड़ी मिसाल बन गई है। उत्तर प्रदेश का बेटा नरेन्द्र कुमार वर्तमान में दुनिया का प्रसिद्ध वैज्ञानिक है। एक समय था जब कई किलोमीटर दूर स्कूल तक जाने के लिए नरेन्द्र के पैरों में चप्पल तक नहीं होती थी। नरेन्द्र को पढ़ाने के लिए उनके पिता ने अपनी सारी जमीन बेच दी। फिर भी काम नहीं चला तो नरेन्द्र ने ठेलों पर रख कर तरबूज बेचे, गार्ड की नौकरी की और यह साबित कर दिया कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं होता है। UP News
जिस नरेन्द्र कुमार की यहां चर्चा चल रही है वह नरेन्द्र कुमार उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के रहने वाले हैं। उत्तर प्रदेश का यह लाड़ला बेटा दिल्ली के प्रसिद्ध कॉलिज दौलत राम कॉलिज में प्रोफेसर तथा वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हैं। पूरी दुनिया नरेन्द्र कुमार को डॉ. नरेन्द्र कुमार के नाम से जानती तथा पहचानती है। नरेन्द्र कुमार की देखरेख में PHD करने के लिए दुनिया भर से छात्र आते हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित मगोर्रा गाँव में एक छोटे से किसान परिवार में हुआ था। वर्तमान में नरेन्द्र कुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। UP News
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के मूल निवासी वर्तमान में एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सफलता के इस दौर में नरेन्द्र कुमार अपने जीवन के शुरूआती समय की गरीबी को हमेशा याद रखते हैं। उन्होंने बताया कि वह किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। माता-पिता और भाई कोई भी परिवार में पढ़ा लिखा नहीं था, लेकिन उनको पढ़ाने के लिए उनके पिता और भाई ने बहुत सहयोग किया। छठी क्लास तक वह बिना चप्पल के स्कूल गए। सातवीं क्लास में पहली बार उन्होंने चप्पल पहनी। अपनी पढ़ाई सरकारी विद्यालय से की। स्कूल की फीस के लिए वह पास के ही एक कस्बे में जाते थे। वहां से तरबूज लाकर बेचते थे। उससे जो पैसा मिलता था, उसी से फीस भरते थे। वे बताते हैं कि उन्हें वह सब कुछ पूरी तरह से याद है। उन्होंने अपना ग्रेजुएशन राजस्थान यूनिवर्सिटी से किया। इसके बाद मास्टर्स की डिग्री के लिए आगरा के इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च में गए, लेकिन वहां पर फीस भरने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे तो पिता ने जमीन बेचकर उनकी पढ़ाई पूरी कराई। UP News
अपने पुराने दिनों को याद करते हुए डॉ. नरेन्द्र कुमार बतातेे हैं कि एक बार काफी तेज बारिश हुई थी। उसमें उनका कच्चा मिट्टी का घर भी बह गया था। उनके घर में रखा अनाज भी भीग गया था और इसे देखकर उनकी मां रो रही थी। तब उन्होंने अपनी मां से कहा था कि हम लोग जन्म जरूर गरीब परिवार में लिए हैं, लेकिन गरीबी में मरेंगे नहीं। इसी तरह पढ़ाई करते हुए फिर वह पहुंचे मुंबई के टाटा कैंसर संस्थान। जहां से इन्होंने फेलोशिप ली, लेकिन फेलोशिप बहुत ज्यादा नहीं थी। वहां पर खर्च निकालने के लिए इन्होंने एक सुपरवाइजर से बात करके उसके साथ उसके फ्लैट में रहना शुरू किया। क्योंकि सुपरवाइजर बिहार का था तो शिक्षा का महत्व समझता था। इसलिए उसने इन्हें अपने साथ रख लिया। वहां पर खर्चा निकालना उनके लिए मुश्किल हो गया था। तब इन्होंने सुपरवाइजर से कहकर वहां पर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी कर ली। UP News
प्रोफेसर नरेंद्र कुमार ने बताया कि मुंबई से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दिल्ली एम्स में गए। वहां पर एक कॉन्फ्रेंस थी। जहां पर उन्हें एक प्रोफेसर मिले। उन्होंने कहा कि अगर तुम पीएचडी करना चाहते हो तो दिल्ली एम्स का एंट्रेंस एग्जाम निकलना होगा। इन्होंने पहले ही प्रयास में दिल्ली एम्स का एंट्रेंस एग्जाम निकाल लिया और उसके बाद एचआईवी एड्स में इन्होंने पीएचडी की। फिर 2017 में उन्हें अमेरिका से ऑफर आया कैंसर पर रिसर्च करने का। तब वह अमेरिका चले गए, लेकिन अमेरिका जाते वक्त इन्होंने एयरपोर्ट पर अपना सिम कार्ड निकाल कर नहीं फेंका, बल्कि 5 साल 9 महीने तक अमेरिका में रहकर इस उम्मीद के साथ रोमिंग दी कि एक दिन लौटकर भारत जाएंगे और अपने इसी नंबर को रखेंगे। इसके बाद भारत लौट आए और अब दौलत राम कॉलेज में डिपार्मेंट ऑफ बायोकेमेस्ट्री लैब के प्रोफेसर हैं। उनके अधीन पीएचडी करने के लिए बच्चों की लाइन लगी रहती है। अमेरिका और यूरोप तक से बच्चे उनके अधीन पीएचडी करने के लिए आ रहे हैं। UP News
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