कुछ महीने पहले लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना मित्र कहकर संबोधित किया था। यह बयान सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि संकेत था कि दिल्ली की राजनीति में भी यूपी का यह चेहरा खास अहमियत रखता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों फिर से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इर्द–गिर्द घूमती दिख रही है। लंबे समय से बड़ी भूमिका की तलाश में जुटे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अब सिर्फ लखनऊ की सत्ता तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि दिल्ली की गलियारों में भी उनकी राजनीतिक मौजूदगी महसूस की जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के भीतर मिल रहे नए–नए संकेतों ने यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या अब उत्तर प्रदेश से उठने वाला यह ओबीसी नेता राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा प्रमोशन पाने की दहलीज पर खड़ा है। लखनऊ में सत्ता के केंद्र से लेकर दिल्ली तक, जहाँ भी राजनीतिक हलकों में उत्तर प्रदेश की चर्चा होती है, वहां केशव प्रसाद मौर्य का नाम जरूर उछलता है। योगी आदित्यनाथ के साथ टकराव की खबरें हों या पार्टी में ओबीसी संतुलन की रणनीति – हर बहस में उत्तर प्रदेश का यही नेता एक अहम कड़ी बन चुका है।
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम के दफ्तर और आवास के बाहर इन दिनों हलचल पहले से ज्यादा नजर आती है। नेता हों, कार्यकर्ता हों या फिर अफसरशाही सबकी कतारें बताती हैं कि उत्तर प्रदेश की सत्ता में केशव प्रसाद मौर्य की ‘पहुँच’ और ‘प्रभाव’ दोनों बढ़े हैं। बदलाव की असली शुरुआत तब दिखी, जब बिहार में विधानमंडल दल का नेता चुनने के लिए भाजपा ने उन्हें केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया। जैसे ही यह खबर लखनऊ पहुँची, यूपी के राजनीतिक गलियारों में यह संदेश साफ हो गया कि दिल्ली का नेतृत्व अब उत्तर प्रदेश से आए इस चेहरे पर अलग तरह का भरोसा जता रहा है। लगातार आठ साल से उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम रहने वाले मौर्य का सीधे केंद्र के कई ताकतवर नेताओं से संपर्क माना जाता है। कुछ महीने पहले लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना मित्र कहकर संबोधित किया था। यह बयान सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि संकेत था कि दिल्ली की राजनीति में भी यूपी का यह चेहरा खास अहमियत रखता है।
एक समय पर “ब्राह्मण–बनिया पार्टी” की छवि में घिरी भाजपा अब उत्तर प्रदेश और देश–भर में खुद को ओबीसी–डॉमिनेंट पार्टी के रूप में पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे दौर में यूपी की राजनीति से निकला एक सशक्त ओबीसी नेता स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में आ जाता है। उत्तर प्रदेश की सामाजिक बुनावट और भाजपा की नई राजनीतिक जरूरतों ने केशव प्रसाद मौर्य के लिए नए अवसरों के दरवाजे खोल दिए हैं। सवाल सिर्फ इतना रह जाता है कि यह अवसर उन्हें लखनऊ की राजनीति में बड़ा दर्जा देगा या फिर दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर कोई नई जिम्मेदारी सौंपेगा।
उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य को भाजपा का बड़ा ओबीसी चेहरा माना जाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव के समय वे यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे और उसी दौर में भाजपा ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी योगी आदित्यनाथ के हिस्से में गई, लेकिन संगठनात्मक मेहनत और यूपी के ओबीसी वोटरों में उनकी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। योगी सरकार के प्रदर्शन के बावजूद 2022 में भाजपा की सीटें 2017 की तुलना में कम हुईं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से पार्टी सिर्फ 34 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक विश्लेषकों का बड़ा वर्ग मानता है कि इस गिरावट के पीछे OBC वोटों में सेंध एक प्रमुख वजह रही। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को भाजपा “इमेज करेक्शन” और “मिशन रिवाइवल” के रूप में देख रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में किसी मजबूत ओबीसी चेहरे को आगे लाना लगभग अनिवार्य हो जाता है। स्वाभाविक है कि इस संदर्भ में सबसे पहले नाम आता है – केशव प्रसाद मौर्य का, जो यूपी के गाँव–देहात और पिछड़े तबके में पहचान रखने वाले नेता हैं।
भाजपा के लिए बिहार चुनाव सिर्फ एक राज्य की लड़ाई नहीं था, बल्कि 2027 और आगे के राष्ट्रीय समीकरणों की तैयारी भी थी। केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी ने बिहार चुनाव में सह–प्रभारी की अहम जिम्मेदारी दी। बिहार में NDA की प्रचंड जीत में OBC–EBC वोट बैंक का एकजुट होना निर्णायक कारक साबित हुआ। बताया जाता है कि मुजफ्फरपुर, दरभंगा और आसपास के जिलों में मौर्य ने 50 से ज्यादा रैलियां और सार्वजनिक बैठकें कीं। उत्तर प्रदेश से गए इस नेता ने बिहार की जमीन पर खड़े होकर ओबीसी–EBC वोटरों के बीच जो संदेश दिया, उसने भाजपा के लिए माहौल बनाने में मदद की। कुर्मी समुदाय से आने वाले मौर्य की सामाजिक पृष्ठभूमि ने बिहार के गैर–यादव OBC को साधने में भी भूमिका निभाई। दिलचस्प यह है कि उनकी इस सफलता की गूंज लखनऊ से ज्यादा दिल्ली और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है, जहाँ इसे “UP से निकले चेहरे की राष्ट्रीय पहचान” के रूप में देखा जा रहा है। 18 नवंबर 2025 को भाजपा संसदीय बोर्ड ने केशव प्रसाद मौर्य को बिहार विधायक दल का नेता चुनने के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया। उनके साथ अर्जुन राम मेघवाल और साध्वी निरंजन ज्योति सह–पर्यवेक्षक बनाए गए। नेता चयन की पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्वक और बिना किसी बड़े विवाद के पूरी हुई। यह बात भी नोट की गई कि उत्तर प्रदेश से आया यह नेता सिर्फ चुनावी मैदान में ही नहीं, बल्कि सत्ता–समीकरण और विधायक दल की राजनीति संभालने में भी भरोसेमंद माना जा रहा है। यूपी की राजनीति पर नजर रखने वाले कई पर्यवेक्षक मानते हैं कि यह नियुक्ति बिहार से ज्यादा उत्तर प्रदेश के लिए संदेश थी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कर दिया कि मौर्य अब सिर्फ लखनऊ की राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय फैसलों के केंद्र में बैठने की क्षमता रखते हैं।
भाजपा में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति लंबे समय से टलती रही है। जब भी इस पद की चर्चा होती है, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का नाम गंभीरता से उभरता है।
ओबीसी पृष्ठभूमि, संगठन में लंबे समय की जमीनी भूमिका, यूपी की राजनीति में मजबूत पकड़, बिहार में सफल प्रयोग और अमित शाह से नजदीकियों की चर्चा – यह सब मिलकर उन्हें पार्टी की OBC–केंद्रित रणनीति के लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनाते हैं। साथ ही, योगी आदित्यनाथ के साथ समय–समय पर सामने आती दूरी और अंदरूनी खींचतान भी भाजपा नेतृत्व के लिए एक संकेत है कि उत्तर प्रदेश के भीतर संतुलन बनाने के लिए किसी वैकल्पिक चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करना पड़ सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसा पद, अगर किसी ओबीसी नेता को देना हो तो यूपी से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य का नाम पहली कतार में दिखता है।
2022 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में दोबारा सरकार बनाई तो डिप्टी सीएम के तौर पर दिनेश शर्मा की जगह ब्रजेश पाठक को मौका दिया गया, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य अपने पद पर बने रहे। यह निर्णय इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वही चुनाव था जिसमें मौर्य अपनी विधानसभा सीट सिराथू से समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार पल्लवी पटेल से करीब 7,000 वोटों से हार गए थे। आम तौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतनी बड़ी हार के बाद किसी नेता का डिप्टी सीएम जैसा अहम पद सुरक्षित रहना आसान नहीं माना जाता। इसके बावजूद उन्हें दोबारा उपमुख्यमंत्री बनाना इस बात का संकेत था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चाहे वह दिल्ली हो या संघ परिवार मौर्य पर भरोसा बनाए हुए है और उन्हें Uttar Pradesh की राजनीति से आगे भी देखने की तैयारी कर रहा है।
दिल्ली में जब भी केशव प्रसाद मौर्य की गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात होती है, उत्तर प्रदेश और दिल्ली दोनों जगह सियासी अटकलों का दौर चल पड़ता है। कहा जाता है कि ये मुलाकातें महज रस्मी नहीं होतीं, बल्कि कई बार इनके बाद यूपी के नेता का राजनीतिक तेवर और ज्यादा आक्रामक और आत्मविश्वासी दिखने लगता है। मौर्य की पहचान सिर्फ उत्तर प्रदेश के सियासी चेहरे के रूप में ही नहीं, बल्कि “काडर से निकले नेता” के रूप में भी है। वे लंबे समय तक आरएसएस और वीएचपी के साथ सक्रिय रहे हैं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े चेहरों में उनकी गिनती होती है। इससे उन्हें संघ परिवार का भरोसा भी हासिल है, जो किसी भी बड़े प्रमोशन की राह में सबसे मजबूत ताकत मानी जाती है। ऐसे में कहा जा रहा है कि केशव प्रसाद मौर्य के राजनीतिक भविष्य में अब सबसे बड़ा फैक्टर सिर्फ “टाइमिंग” है कब और किस मौके पर पार्टी उन्हें Uttar Pradesh से आगे निकालकर राष्ट्रीय मंच पर सबसे ऊंची भूमिका में पेश करती है।